Thursday, March 5, 2026
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क्या भारत को छोड़ चीन के करीब जा रहा है मालदीव?

मालदीव अब भारत को छोड़ चीन के करीब जा रहा है! बीते कुछ समय में मालदीव की भारत के साथ संबंधों में खटास आई है तो चीन के साथ उसके रिश्ते बेहतर हुए हैं। इसका असर मालदीव मे आने वाले पर्यटकों पर भी होता दिख रहा है। ऐसा लगता है कि चीनी मालदीव के उस नुकसान की भरपाई की कोशिश में लगे हैं, जो उसको भारत से टकराव के वजह से टूरिज्म में रहा है। ये एक तरह से चीन की मालदीव को लुभाने की कोशिश नजर आती है। जनवरी के शुरू और आखिर में मालदीव में पहुंचने वाले विदेशी पयर्टकों की संख्या को देखा जाए तो साफ नजर आता है कि मुइज्जू के बीजिंग दौरे का फायदा उनको टूरिज्म में भी मिला है और बड़ी संख्या में चीनी मालदीव का रुख कर रहे हैं। जनवरी की दो तारीखों का आंकड़ा ये बताता है कि कैसे चीनी लोग मालदीव का रुख कर रहे हैं। जनवरी के पहले दो दिन यानी 2 जनवरी तक मालदीव पहुंचने वाले विदेश पर्यटकों में टॉप-3 में इटली, रूस और भारत थे। 2 जनवरी तक इटली के 2582, रूस के 1516 और 842 भारतीय मालदीव पहुंचे थे। इसके बाद जर्मनी, अमेरिका, कजाख्सतान और स्विट्जरलैंड का नंबर था। 2 जनवरी को चीन शीर्ष 10 में भी नहीं था लेकिन इसके 26 दिन बाद चीजें काफी हद तक बदल गईं। 28 जनवरी को मालदीव पहुंचने वाले विदेशी पर्यटकों में रूस और इटली ही टॉप-2 में शामिल रहे लेकिन तब तक तीसरे नबंर पर चीन आ गया। मालदीव में 28 जनवरी तक रूस और इटली से 28 जनवरी कतक 18 हजार से ज्यादा पर्यटक पहुंचे तो चीन से 16,529 पर्यटक पहुंचे। इसके बाद यूके, इंडिया और जर्मनी के पर्यटकों का नंबर आता है।

भारत से मालदीव जाने वाले पर्यटकों की संख्या में भारी गिरावट आई है। 2023 में मालदीव में सबसे ज्यादा पर्यटक भारत से पहुंचे थे। इस साल के पहले महीने यानी में जनवरी में भारत इस लिस्ट में पांचवें स्थान पर आ गया है। मालदीव के पर्यटन मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले तीन सालों में हर साल दो लाख से ज्यादा भारतीयों ने मालदीव की यात्रा की। वहीं इस साल मालदीव में 28 जनवरी तक 1.74 लाख पर्यटक आए। जिनमें से केवल 13,989 भारतीय थे।

रूस से सबसे ज्यादा 18,561 पर्यटक मालदीव पहुंचे। इसके बाद इटली से 18,111 और तीसरे नंबर पर चीन से 16,529 लोग मालदीव गए हैं। चौथे नंबर पर ब्रिटेन है। बीते साल यानी 2023 में करीब 17 लाख पर्यटक मालदीव पहुंचे थे। जिनमें से सबसे ज्यादा 2,09,198 लोग भारतीय थे। इसके बाद रूस से 2,09,146 और चीन से 1,87, 118 पर्यटक थे। मालदीव में भारतीय पर्यटकों की संख्या 2022 में 2.4 लाख से ज्यादा और 2021 में 2.11 लाख के करीब थी।

बता दे कि भारत और मालदीव के रिश्ते में बीते कुछ महीनों से लगातार तनाव देखने को मिल रहा है, जो हाल के दिनों में काफी ज्यादा बढ़ा है। लंबे समय तक एक-दूसरे के भरोसेमंद सहयोगी रहे भारत और मालदीव के बीच रिश्तों में तनाव का फायदा उठाने में चीन जुटा हुआ है। चीन जिस तरह से मालदीव का इस्तेमाल कर रहा है, वह भारत की सुरक्षा के लिए खतरा के सबब भी हो सकता है। इसमें सबसे नई बात जो सामने आई है, वो ये है कि मालदीव ने चीन के अनुसंधान पोत जियांग यांग होंग-3 को इजाजत दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि ये अनुसंधान जहाज वास्तव में चीन के लिए एक सैन्य उद्देश्य की पूर्ति करता है और ये जहाज जासूसी के काम में आने वाले साजो-सामान से लैस है।

चीनी जहाज का मालदीव जाना इसलिए चिंता का सबब है क्योंकि इसका मकसद हिंद महासागर में संवेदनशील सैन्य परीक्षणों की जासूसी करना हो सकता है। इसके अलावा जहाज द्वारा जुटाए गए समुद्री डेटा से चीन की पनडुब्बी युद्ध करने और क्षेत्र में सैन्य अभियानों की योजना बनाने की क्षमता में मददगार साबित होगा। जो निश्चित ही भारत के लिए सुरक्षा की दृष्टि से अच्छी खबर नहीं है।

बीते कई दशकों से भारत ही मालदीव का सबसे करीबी रक्षा साझेदार है। 2018 से 2023 तक मालदीव के राष्ट्रपति रहे इब्राहिम सोलिह कहते हैं कि मालदीव भारत की संवेदनशीलता का सम्मान करने में सावधान था और उसने चीन के साथ बहुत कम सुरक्षा सहयोग किया। 2023 में चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बने मोहम्मद मुइज्जू का नजरिया इससे एकदम अलग है। मुइज्जू अपने से पूर्व की सरकारों के “इंडिया फर्स्ट” नीति का समर्थन नहीं करते हैं। मुइज्जू ने चुनाव जीतने के तुरंत बाद ही भारत सरकार से मालदीव में अपने सैन्यकर्मियों को वापस बुलाने के लिए कहा है। मुइज्जू ने राष्ट्रपति के रूप में अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भी चीन को ही चुना। उन्होंने साफतौर पर चीन की मालदीव में भूमिका बढ़ाने और भारत पर निर्भरता कम करने का इशारा किया है। चीन से मालदीव के रिश्ते को समझने के लिए दोनों देशों के बीच संबंधों से शुरुआत से ही चीजों को देखना होगा।

बीते साल, 2023 में चीजें फिर से बदलीं जब मोहम्मद मुइज्जू ने राष्ट्रपति चुनाव में सोलिह को हरा दिया। चुनाव जीतते ही मुइज्जू ने भारत से मालदीव में अपने सैन्य कर्मियों को हटाने को कहा और एक प्रमुख रक्षा समझौते को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया। इसके बाद हाल ही में पीएम नरेंद्र मोदी के लक्षद्वीप दौरे के बाद उनके मंत्रियों की टिप्पणियों से हुए विवाद ने भी द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचाया। दूसरी ओर मुइज्जू पदभार संभालने के बाद से चीन-मालदीव संबंध अच्छे हुए हैं। उनकी सरकार ने चीन के साथ कई आर्थिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें से कई भारत पर निर्भरता कम करने के लिए निर्धारित थे। इसके बाद हाल ही में चीनी जहाज जियांग यांग होंग 3 को मालदीव ने इजाजत दी है।

क्या भारत ने की है मालदीव के बजट में बढ़ोतरी?

भारत ने मालदीव के बजट में बढ़ोतरी कर दी है! भारत और मालदीव के बीच पिछले कुछ समय से तनातनी चल रही है। लेकिन आज पेश अंतरिम बजट के मुताबिक 2023-24 में मालदीव का संशोधित बजट में 770.90 करोड़ रुपये है। भारत ने मालदीव के लिए शुरुआत में 400 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। लेकिन संशोधित बजट में यह रकम करीब दोगुनी कर दी गई है। मालदीव अरब सागर में स्थित एक द्वीप देश है जहां भारत कई इन्फ्रा प्रोजेक्ट बना रहा है। भारत और मालदीव के बीच तनाव की शुरुआत तब हुई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लक्षद्वीप दौरे पर मालदीव के तीन मंत्रियों ने आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। भारत की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद इन तीनों मंत्रियों को हटा दिया गया था। लेकिन इसके साथ ही भारत में मालदीव के बहिष्कार की मुहिम भी शुरू हो गई थी। बजट डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक फाइनेंशियल ईयर 2024 में मालदीव को 400 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था जो मालदीव के बजट का 1.5 परसेंट है। पिछले वित्त वर्ष में भारत ने विदेशों को जितना आवंटन किया उसका 6.84 फीसदी मालदीव को गया था। लेकिन अब मालदीव का संशोधित बजट 770.90 करोड़ रुपये कर दिया गया है। भारत और मालदीव के संबंधों में हाल में कड़वाहट आई है। मोदी के लक्षद्वीप दौरे पर मालदीव के मंत्रियों की टिप्पणी भारत को नागवार गुजरी। भारत की नाराजगी जताने के बाद इन मंत्रियों की छुट्टी कर दी गई लेकिन भारत में सोशल मीडिया पर #BoycottMaldives ट्रेंड करने लगा।

इस बीच मालदीव जाने वाले भारतीय पर्यटकों की संख्या में काफी गिरावट आई है। मालदीव सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक पिछले तीन हफ्ते में देश की टूरिज्म रैंकिंग में भारत पांचवें स्थान पर चला गया है। पिछले लगातार तीन साल मालदीव जाने वाले पर्यटकों में भारतीयों की संख्या सबसे ज्यादा थी। 2023 में मालदीव के टूरिज्म मार्केट में भारत की हिस्सेदारी 11% थी। लेकिन 28 जनवरी के आंकड़ों के मुताबिक भारत की हिस्सेदारी महज आठ फीसदी रह गई है। इस रैंकिंग में रूस पहले, इटली दूसरे, चीन तीसरे, यूके चौथे और भारत पांचवें नंबर है। पिछले तीन हफ्ते के दौरान 13,989 भारतीय पर्यटक मालदीव पहुंचे। बता दें कि भारत और मालदीव के बीच तनाव की शुरुआत तब हुई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवंटन किया उसका 6.84 फीसदी मालदीव को गया था। लेकिन अब मालदीव का संशोधित बजट 770.90 करोड़ रुपये कर दिया गया है। भारत और मालदीव के संबंधों में हाल में कड़वाहट आई है। मोदी के लक्षद्वीप दौरे पर मालदीव के मंत्रियों की टिप्पणी भारत को नागवार गुजरी। भारत की नाराजगी जताने के बाद इन मंत्रियों की छुट्टी कर दी गई लेकिन भारत में सोशल मीडिया पर #BoycottMaldives ट्रेंड करने लगा।लक्षद्वीप दौरे पर मालदीव के तीन मंत्रियों ने आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। भारत की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद इन तीनों मंत्रियों को हटा दिया गया लेकिन इसके साथ ही मालदीव का बहिष्कार भी शुरू हो गया। कई ट्रैवल एजेंसियों ने मालदीव के लिए फ्लाइट बुकिंग्स कैंसल कर दी। सोशल मीडिया पर #BoycottMaldives ट्रेंड करने लगा। कई भारतीयों ने मालदीव की बुकिंग कैंसल कर दी और इसका स्क्रीन शॉट सोशल माडिया पर शेयर किया। 2023 में मालदीव के टूरिज्म मार्केट में भारत की हिस्सेदारी 11% थी।

मालदीव सरकार का आंकड़ों के मुताबिक 28 जनवरी तक कुल 174,400 पर्यटक मालदीव आए। इनमें केवल 13,989 भारतीय थे। इस दौरान रूस के 18,561, इटली के 18,111, चीन के 16,529 और यूके के 14,588 पर्यटक मालदीव पहुंचे। दिसंबर, 2023 में मालदीव के टूरिज्म मार्केट में रूस की हिस्सेदारी 24.1% और भारत की 23.4% थी। 2023 में दो लाख से अधिक भारतीय पर्यटकों ने मालदीव की यात्रा की। भारत की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद इन तीनों मंत्रियों को हटा दिया गया लेकिन इसके साथ ही मालदीव का बहिष्कार भी शुरू हो गया। कई ट्रैवल एजेंसियों ने मालदीव के लिए फ्लाइट बुकिंग्स कैंसल कर दी। सोशल मीडिया पर #BoycottMaldives ट्रेंड करने लगा। कई भारतीयों ने मालदीव की बुकिंग कैंसल कर दी और इसका स्क्रीन शॉट सोशल माडिया पर शेयर किया। बता दें कि भारत और मालदीव के संबंधों में हाल में कड़वाहट आई है। मोदी के लक्षद्वीप दौरे पर मालदीव के मंत्रियों की टिप्पणी भारत को नागवार गुजरी। भारत की नाराजगी जताने के बाद इन मंत्रियों की छुट्टी कर दी गई लेकिन भारत में सोशल मीडिया पर #BoycottMaldives ट्रेंड करने लगा। 2023 में मालदीव के टूरिज्म मार्केट में भारत की हिस्सेदारी 11% थी।इसके बाद रूस और चीन का नंबर है। उससे पहले 2021 और 2022 में भी मालदीव जाने वाले पर्यटकों में भारत पहले नंबर पर था। 2021 में 2.91 लाख से अधिक भारतीय मालदीव पहुंचे थे जबकि 2022 में यह संख्या 2.41 लाख थी।

आखिर क्या है IMEC? जो बनेगा भारत के लिए गेम चेंजर?

आज हम आपको IMEC के बारे में जानकारी देने वाले हैं जो भारत के लिए गेम चेंजर बन सकता है! दुनिया में अशांति है। रूस और यूक्रेन के बीच जंग जारी है। इजरायल और हमास में छिड़ी जंग दूसरे देशों को भी अपनी जद में ले रही है। इसने अंतरराष्‍ट्रीय कारोबार को अंधी गलियों में धकेल दिया है। भारत इन चक्‍करों से दूर है। अब तक उसने किसी एक खेमे में शामिल होने से दूरी बनाई है। उसका टारगेट बड़ा साफ है। तीन साल के अंदर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्‍यस्‍था बन जाना। क्षेत्र में उसका सबसे बड़ा और कट्टर प्रतिद्वंद्वी सिर्फ एक है। वो है चीन। ड्रैगन बेल्‍ट एंड रोड इनीशिएटिव बीआरआई के जरिये पूरी दुनिया में अपना माल पाट देने की जुगाड़ में है। यह उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है। चीन की इस महात्‍वाकांक्षी योजना में भारत हिस्‍सा नहीं है। कारण है पाकिस्‍तान। यह कॉरिडोर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को शामिल करता है जो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से होकर गुजरता है। भारत इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन मानता है। अलबत्‍ता, भारत बीआरआई का जवाब आईएमईसी से देने की तैयारी में है। इंडिया-मिडिल ईस्‍ट- यूरोप इकनॉमिक कॉरिडोर को लेकर सरकार का बड़ा प्‍लान है। वित्‍त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अंतरिम बजट में इसका जिक्र भी किया है। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का अंतिम बजट पेश करते हुए सीतारमण ने आईएमईसी को भारत के लिए गेम चेंजर बताया है। उन्‍होंने कहा है कि इससे आर्थिक गतिविधियों को बड़ा प्रोत्‍साहन मिलेगा। सरकार इस पर फोकस बनाए हुए है। इसके जरिये भारत को सड़कों के नेटवर्क से पश्चिम एशिया और यूरोप को जोड़ने का प्‍लान है। वित्‍त मंत्री ने यह बात ऐसे समय कही है जब लाल सागर के जरिये एशिया और यूरोप के बीच समुद्री कॉरिडोर में हूती विद्रोहियों के हमलों से व्‍यवधान पड़ा है। इसने केप ऑफ गुड होप के रास्‍ते मालवाहक जहाजों को ज्‍यादा लंबा रूट लेने पर मजबूर किया है। इसने यूरोप को होने वाले भारतीय निर्यात को महंगा बनाया है।

भारत, मध्य पूर्व और यूरोप को जोड़ने वाले इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप कॉरिडोर की प्‍लानिंग 2023 में जी20 शिखर सम्मेलन में शुरू हुई थी। यह भारत को यूरोप और मिडिल ईस्‍ट के बाजारों तक बेहतर पहुंच प्रदान करेगा। आईएमईसी में 13 देश शामिल हैं। इनमें भारत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, इजरायल, फ्रांस, इटली, जर्मनी, नीदरलैंड, बेल्जियम, ऑस्ट्रिया, चेक गणराज्य, स्लोवाकिया और हंगरी हैं। IMEC को चीन के बीआरआई का जवाब मना जाता है। हालांकि, इजरायल और हमास में छिड़ी जंग के बीच अभी इसके अमलीजामा पहनने में अड़चनें हैं। इजयराल और जॉर्डन को इस गलियारे में अहम भूमिका निभानी हैं। लेकिन, जंग के बीच दोनों ही एक-दूसरे के सामने खड़े हैं। सीतामरण ने भी इस चुनौती का जिक्र किया है। उन्‍होंने कहा है कि युद्धों और संघर्षों के कारण दुनिया तेजी से बदल गई है। इसके कारण सप्‍लाई चेन में बाधाएं आने लगी हैं। इसने दुनिया के सामने चुनौती खड़ी कर रखी है। IMEC को सीतारमण ने भारत और दूसरे देशों के लिए गेम चेंजर बताया। अभी भारतीय कंपनियां स्‍वेज नहर के जरिये लाल सागर का इस्‍तेमाल करती हैं। इसी रूट से भारतीय माल यूरोप, उत्‍तरी अमेरिका, उत्‍तरी अफ्रीका और पश्चिम एशिया के कई हिस्‍सों में पहुंचता है।

चीन के बीआरआई को ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ के नाम से भी जाना जाता है। यह एक बड़ा प्रोजेक्‍ट है। इसकी शुरुआत 2013 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने की थी।सरकार इस पर फोकस बनाए हुए है। इसके जरिये भारत को सड़कों के नेटवर्क से पश्चिम एशिया और यूरोप को जोड़ने का प्‍लान है। वित्‍त मंत्री ने यह बात ऐसे समय कही है जब लाल सागर के जरिये एशिया और यूरोप के बीच समुद्री कॉरिडोर में हूती विद्रोहियों के हमलों से व्‍यवधान पड़ा है। इसने केप ऑफ गुड होप के रास्‍ते मालवाहक जहाजों को ज्‍यादा लंबा रूट लेने पर मजबूर किया है। इसने यूरोप को होने वाले भारतीय निर्यात को महंगा बनाया है। इसका मकसद एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जमीनी और समुद्री नेटवर्क से जोड़कर व्यापार और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है।इसी रूट से भारतीय माल यूरोप, उत्‍तरी अमेरिका, उत्‍तरी अफ्रीका और पश्चिम एशिया के कई हिस्‍सों में पहुंचता है। भारत बीआरआई का हिस्सा नहीं है। कारण है कि यह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को शामिल करता है। यह पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से होकर गुजरता है। भारत इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन मानता है।

आखिर कैसे बटेगा बिहार में मंत्रियों के पास विभाग?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि बिहार में मंत्रियों के पास विभाग कैसे बटेगा! जेडीयू नेता नीतीश कुमार ने महागठबंधन का साथ छोड़ कर 129 विधायकों के समर्थन से सरकार तो बना ली, लेकिन अभी उनके साथ शपथ लेने वाले मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा नहीं हो सका है। मंत्रिमंडल के विस्तार को लेकर भी नीतीश किसी निर्णय पर नहीं पहुंच सके हैं। माना जा रहा है कि भाजपा की ओर से वे ग्रीन सिग्नल का इंतजार कर रहे हैं। हालांकि इसके पहले नीतीश आठ बार सीएम बने, पर विभागों के बंटवारे और मंत्रिमंडल के विस्तार में इतना वक्त कभी नहीं लगा। हालांकि महागठबंधन के सीएम पद से इस्तीफा देने के पांच घंटे बाद ही उन्होंने आठ मंत्रियों के साथ शपथ ले ली थी। मंत्रियों के विभाग अब तक न बंट पाने की दो बड़ी वजहें बताई जा रही हैं। पहली वजह तो यह मानी जा रही है कि बीजेपी की ओर से ही इस पर अब तक मुहर नहीं लगी है। दूसरी चर्चा यह है कि नीतीश कुमार जो विभाग जेडीयू कोटे में चाहते हैं, वह भाजपा उन्हें देने को तैयार नहीं है। कहा जा रहा है कि नीतीश गृह विभाग अपने पास रखने की जिद पर अड़े हुए हैं। भाजपा यह विभाग अपने किसी मंत्री को देना चाहती है। इसी खींचतान के कारण विभागों का बंटवारा नहीं हो पा रहा है। दरअसल नीतीश की जिद का कारण यह बताया जा रहा है कि पिछले 18 साल से उनके ही पास गृह विभाग रहा है। यानी 18 साल से नीतीश बिहार के सीएम के साथ गृहमंत्री भी रहे हैं। इस बार भी वे गृह विभाग अपने पास ही रखना चाहते हैं।

गृह विभाग किसी भी सरकार के लिए लिए शासन-प्रशासन की कुंजी होता है। नीतीश यह कुंजी किसी को देना नहीं चाहते। वर्ष 2020 में नीतीश कुमार जब सातवीं बार बिहार के सीएम बने, तब भी उन्होंने यह विभाग अपने पास ही रखा था। महागठबंधन के साथ नीतीश ने 2022 में जब सरकार बनाई, तब भी आरजेडी के विधायकों की संख्या अधिक होने के बावजूद उन्होंने गृह विभाग अपने पास ही रखा। इस बार भी वे इसे अपने पास ही रखना चाहते हैं। हालांकि वे भाजपा पर दबाव बनाने की स्थिति में नहीं हैं। उनकी मौजूदा हालत ऐसी है कि भाजपा के डिक्टेशन पर चलना उनकी मजबूरी है। अब तक जिस तरह तिकड़म से वे साथी दलों को साधते रहे हैं, इस बार उसमें उन्हें कामयाबी नहीं मिल रही है। इसलिए कि उन्होंने अपनी पहल पर भाजपा का साथ लिया है। यानी नैतिक रूप से वे भाजपा पर दबाव बनाने के स्थिति में नहीं हैं। उनके पास विधायकों का संख्या बल भी ऐसा नहीं है कि वे भाजपा से अपनी जिद मनवा सकें। भाजपा की कृपा से ही यह विभाग उन्हें मिल सकता है।

नीतीश कुमार इससे पहले इतने लाचार कभी नहीं थे। इस बार उनके पास अपनी पार्टी जेडीयू के महज 45 विधायक ही हैं। दूसरा यह कि वे महागठबंधन से तकरार कर एनडीए में आए हैं। यही कारण है कि एनडीए में रहते वे जिस विजय सिन्हा के खिलाफ विधानसभा में आग बबूला हो गए थे, उन्हें डेप्युटी सीएम के रूप में उन्हें स्वीकार करना पड़ा। इतना ही नहीं, जिस सम्राट चौधरी ने उन्हें सीएम की कुर्सी से बेदखल करने के लिए पगड़ी बांध रखी थी, उन्हें भी डेप्युटी सीएम बनाने में उन्हें कोई एतराज नहीं हुआ। ऐसी स्थिति में नीतीश भाजपा से अपनी जिद मनवा लेंगे, ऐसा होता नहीं दिख रहा है।

विधानसभा का बजट सत्र 12 फरवरी से शुरू हो रहा है। इसी सत्र में स्पीकर अवध बिहारी चौधरी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग होनी है। चौधरी आरजेडी कोटे से आते हैं। तेजस्वी यादव ने खेल अब शुरू होने की बात कह कर सस्पेंस बढ़ा दिया है। पहले भी जेडीयू के लोगों को तोड़ कर नीतीश को अपदस्थ करने की आरजेडी की कवायद की खबरें आ चुकी हैं। हालांकि यह नौबत आने से पहले ही नीतीश ने एनडीए से हाथ मिला कर आरजेडी के खेल को बिगाड़ दिया था। अब माना जा रहा है कि आरजेडी अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जेडीयू के अपने करीबी वैसे विधायकों को पटा कर सरकार को झटका दे सकता है। तेजस्वी ने शायद इसी खेल की ओर इशारा किया था। विभागों के बंटवारे और मंत्रिमंडल विस्तार में सबसे बड़ी बाधा यही है। नीतीश किसी को नाराज करने के बजाय सबको प्रलोभन देकर पटाए रखने की रणनीति पर चल रहे हैं। यह कितना कारगर होगा, देखना बाकी है। प्रवीण बागी का कहना है कि जिन मंत्रियों ने शपथ ले ली है, उनके विभाग बांटना तो मजबूरी है। अलबत्ता मंत्रिमंडल का विस्तार सत्र की समाप्ति के बाद होने की अधिक संभावना है।

भाजपा बिहार में बढ़ते अपराध पर अंकुश लगा कर ठीक उसी तरह का कीर्तिमान बनाना चाहती है, जैसा 2005 से 2010 के कार्यकाल में नीतीश कुमार ने कर दिखाया था। भाजपा को गृह विभाग मिलने पर वह अपराधियों पर नकेल कसने के लिए यूपी का बुलडोजर मॉडल अपना सकती है। लोकसभा चुनाव में भाजपा लोगों को यह संदेश देना चाहेगी कि उसके आते ही अपराध काबू में आ गए। यूपी मॉडल में जाति-धर्म की परवाह किए बिना अपराधियों के साथ सरकार सख्ती बरतती रही है। बड़े-बड़े डान औकात में आ गए हैं। भाजपा की मंशा बिहार में वैसा ही कुछ कर दिखाने की है। भाजपा के भरोसेमंद सूत्र के मुताबिक नीतीश को साथ देकर यह काम वह कर सकती है, लेकिन क्रेडिट उसे शायद ही मिले। बिहार में तो क्रेडिट लेने की जंग में ही महागठबंधन की सरकार का अंत हो गया था। ऐसी किसी स्थिति से बचने के लिए भाजपा पहले ही यह लफड़ा सुलझा लेना चाहती है।

सबसे पहले कौन लाएगा भारत में समान नागरिक संहिता?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि भारत में सबसे पहले समान नागरिक संहिता कौन लाएगा! उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता की ड्राफ्ट रिपोर्ट मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को सौंप दी गई है है। मई 2022 में उत्तराखंड सरकार की ओर से गठित पांच सदस्यीय समिति ने 20 महीने तक चले एक वृहत पब्लिक आउटरीच एक्सरसाइज के बाद शुक्रवार को देहरादून में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को अपनी रिपोर्ट सौंप दी। अगर यूनिफॉर्म सिविल कोड के इस ड्राफ्ट को कानूनी जामा पहनाते हुए लागू किया गया तो उत्तराखंड ऐसा करने वाला पहला राज्य बन जाएगा। कमिटी की मुख्य जिम्मेदारी उत्तराखंड के निवासियों के लिए विवाह, तलाक, लिव-इन रिलेशनशिप, संपत्ति के अधिकार, उत्तराधिकार, विरासत, गोद लेने, रख-रखाव, हिरासत और संरक्षकता जैसे व्यक्तिगत नागरिक मामलों को विनियमित करने वाले प्रासंगिक कानूनों की जांच करना था। सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली कमिटी को पिछले साल के अंत में ही अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी। आखिरी समय में निर्णय हुआ कि मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे गए मसौदे का हिंदी में अनुवाद किया जाना चाहिए। देवभूमि के सार को सुरक्षित रखा जाना जरूरी माना गया। कमिटी को लगा कि अगर राज्य विधायी विभाग अनुवाद करेगा तो कुछ बिंदुओं की गलत व्याख्या हो सकती है। इसलिए, बड़ी जिम्मेदारी कमिटी के सदस्यों शत्रुघ्न सिंह, मनु गौड़ और डॉ. सुरेखा डंगवाल पर आ गई। अधिकारियों का कहना है कि इससे ड्राफ्ट जमा करने में देरी हुई। विशेषज्ञ समिति की ओर से दो उप- समितियां बनाई गई। रिटायर्ड जस्टिस प्रमोद कोहली, मनु गौड़ और शत्रुघ्न सिंह के पहले पैनल कोड का मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी। दूसरी सब कमिटी में मनु गौर, शत्रुघ्न सिंह और डॉ. सुरेखा डंगवाल शामिल थे। उन्हें हितधारकों से परामर्श करने की जिम्मेदारी दी गई थी। कमिटी ने पब्लिक मीटिंग की। इसके अलावा हरिद्वार में हिंदू धार्मिक नेताओं से मुलाकात की गई। उन्होंने सभी हिंदू अखाड़ों से बात की। कमिटी ने कलियर शरीफ, मैंगलोर, रामनगर, हलद्वानी, काशीपुर और विकास नगर जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में भी बैठकें कीं। कमिटी ने अन्य देशों में नागरिक मामलों पर कानूनों का भी अध्ययन किया। इसमें वे देश भी शामिल हैं, जहां धार्मिक आधार पर एक समान कानून नहीं है। साथ ही, उन देशों के कानून का अध्ययन किया गया, जहां कानून धर्म के आधार पर तैयार किए गए हैं।

कमिटी ने नागरिक कानूनों से संबंधित विभिन्न आयोगों के समक्ष विभिन्न मामलों के साथ-साथ व्यक्तिगत और धार्मिक कानूनों एवं धार्मिक रीति- रिवाजों का भी अध्ययन किया। पैनल ने राज्य में सक्रिय सभी 10 राजनीतिक दलों को आमंत्रित किया। इनमें से कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और सीपीआई को छोड़कर सात ने भाग लिया। दलों ने मसले पर अपने विचार और सुझाव साझा किए। इसने सभी वैधानिक आयोगों को भी पूरा किया। आईए इस कमिटी के सदस्यों के बारे में जानते हैं।

पुष्कर सिंह धामी सरकार ने जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई के नेतृत्व में कमिटी का गठन किया। सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई वर्ष 1973 में गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री पूरी करने के बाद कानूनी पेशे में आईं। उन्हें 1979 में बॉम्बे हाई कोर्ट में सरकारी वकील और फिर हाई कोर्ट में निवारक हिरासत मामलों के लिए विशेष लोक अभियोजक नियुक्त किया गया था। 1996 में बॉम्बे हाई कोर्ट और 2011 में सुप्रीम कोर्ट में उन्हें प्रमोट किया गया। केंद्र सरकार ने उन्हें एक पैनल की सिफारिश करने के लिए गठित खोज समिति का अध्यक्ष बनाया। इसमें लोकपाल के अध्यक्ष और सदस्यों को चुना जाना है। उन्होंने 6 मार्च 2020 में जम्मू और कश्मीर, असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और नागालैंड के लिए परिसीमन आयोग के अध्यक्ष के रूप में भी कार्यभार संभाला।

उत्तराखंड यूसीसी कमिटी के सदस्य में रिटायर्ड जस्टिस प्रमोद कोहली शामिल हैं। जस्टिस कोहली ने 1972 में जम्मू विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की। वर्ष 1990 में राज्यपाल शासन की अवधि के दौरान उन्हें जम्मू और कश्मीर का अतिरिक्त महाधिवक्ता नियुक्त किया गया। बाद में उन्होंने तत्कालीन राज्य के महाधिवक्ता के रूप में पदभार संभाला। उन्होंने संवैधानिक, नागरिक, कराधान और कानून की अन्य शाखाओं पर मामले चलाए। श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड और श्री माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय के कानूनी सलाहकार बने। वर्ष 2003 तक वे इस पद पर रहे। जनवरी 2003 में उन्हें जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया। 2006 में उन्हें झारखंड हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया। बाद में उन्हें पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में स्थानांतरित किया गया। 2011 में जस्टिस कोहली सिक्किम हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के पद पर प्रमोट किए गए। वहां से वह 2013 में सेवानिवृत्त हुए। रिटायरमेंट के बाद उन्हें केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

उत्तराखंड यूनिफॉर्म सिविल कोड कमिटी के सदस्य शत्रुघ्न सिंह आईआईटीयन आईएएस हैं। वे 1983 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। उन्होंने आईआईटी खड़गपुर से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की है। वह नवंबर 2015 में उत्तराखंड के 13वें मुख्य सचिव बने और एक साल तक इस पद पर रहे। सेवानिवृत्ति के बाद शत्रुघ्न सिंह को तत्कालीन भाजपा सरकार ने राज्य का मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त किया गया था। सीआईसी पद से इस्तीफा देने के तुरंत बाद उन्हें तत्कालीन सीएम तीरथ सिंह रावत का मुख्य सलाहकार नामित किया गया। शत्रुघ्न सिंह अयोध्या राम मंदिर निर्माण समिति के सदस्य भी हैं।

उत्तराखंड के रहने वाले मनु गौड़ पेशे से कृषक हैं। वह टैक्सपेयर्स एसोसिएशन ऑफ भारत के अध्यक्ष भी हैं। यह करदाताओं के कल्याण, जनसंख्या नियंत्रण, सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों के पुनरुद्धार और भारत के विकास के मुद्दे पर काम करने वाला एक राष्ट्रीय स्तर का पंजीकृत संगठन है।अएक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर मनु गौर को जनसंख्या नियंत्रण पर पहले जिम्मेदार पितृत्व विधेयक का मसौदा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई थी। इसे दिसंबर 2018 में एक निजी सदस्य विधेयक के रूप में पेश किया गया था। इस विधेयक को 125 सांसदों का समर्थन मिला। 2012 से यूसीसी और जनसंख्या नियंत्रण के मुद्दे पर मनु गौड़ काम कर रहे हैं। यूसीसी ड्राफ्ट कमिटी की सदस्य डॉ. सुरेखा डंगवाल देहरादून में दून विश्वविद्यालय के कुलपति हैं। इससे पहले उन्होंने उत्तराखंड के श्रीनगर शहर में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में अंग्रेजी, आधुनिक यूरोपीय और अन्य विदेशी भाषाओं के एचओडी के रूप में कार्य किया। डॉ. डंगवाल के पास 34 वर्षों का शिक्षण और अनुसंधान अनुभव है। वह प्रतिष्ठित जर्मन डीएएडी फेलोशिप हासिल कर चुकी हैं। उनकी शोध रुचि दक्षिण एशियाई महिला अध्ययन, प्रवासी साहित्य और साहित्यिक सिद्धांत पर केंद्रित है।

मॉडल पूनम पांडे की मौत के झूठे नाटक के लिए क्या बोले लोग?

मॉडल पूनम पांडे की मौत के झूठे नाटक के लिए लोगों ने सोशल मीडिया पर कॉमेंट्स की बहार ला दी है! मजाक करने की भी एक सीमा होती है लेकिन पूनम पांडे ने तो सारी हदें ही पार कर दीं। मजाक भी ऐसा कि लोग अब तक इसे नहीं पचा पा रहे हैं। कैंसर जैसी घातक और जानलेवा बीमारी के लिए कोई ऐसे जागरुकता फैलाता है भला! वो कैंसर जिसका नाम सुनकर देश ही नहीं दुनियाभर के लोगों की सांसें ऊपर नीचे होने लगती हैं, जिससे जूझते हुए मरीज ही नहीं पूरा घर टूट जाता है, ऐसा रोग जिससे लड़ते-लड़ते हर साल भारत में 10 लाख लोग काल के गाल में समा जाते हैं। आपने उसके नाम पर ऐसा भद्दा मजाक किया? कैंसर के जिस प्रकार के नाम पर आपने अपने मौत की झूठी स्क्रिप्ट लिखी, उससे जूझने वाली महिलाओं के दर्द की कल्पना मात्र भी कर लेतीं तो शायद आपको यह सब न करना पड़ता। 24 घंटे पहले(शुक्रवार), सर्वाइकल कैंसर की बीमारी के चलते अपने फैंस को अलविदा कहने वाली पूनम ठीक 24 घंटे बाद यानी आज शनिवार को कैमरे पर आती हैं और कहती हैं कि मेरी मौत की अफवाह झूठी थी और मुझे सर्वाइकल कैंसर नहीं था। मैं तो बस महिलाओं में तेजी से फैल रहे इस रोग के लिए जागरूक करना चाहती थी। इस चीप कहें या सस्ती पब्लिसिटी, आपको क्या मिला? फैंस ही नहीं, बाकी लोग भी आपके इस कृत्य से गुस्से में हैं। पूरा सोशल मीडिया आप पर गुस्सा निकाल रहा है। आपको अंदाजा भी नहीं है कि आपने जो किया है, उसका क्या रिजल्ट निकल सकता है। पूनम जी जिस बीमारी के बारे में जागरुकता फैलाने के नाम पर आपने अपने आपको ही मार दिया, उस कैंसर की गंभीरता को आप समझिए। शायद आप ऐसा चीप स्टंट करने से पहले 100 बार सोचें। पूनम पांडे का फैन बेस क्या है, किसी से छिपा नहीं है। जो पूनम पांडे को जानते हैं उन्हें यह भलीभांति मालूम है। इसे विस्तार से बताने की जरूरत नहीं है। चूंकि पूनम मॉडल भी हैं तो फिल्म इंडस्ट्री से भी उनका थोड़ा बहुत नाता है। शुक्रवार को जो फैंस उनकी झूठी मौत पर शॉक थे, सांत्वना दे रहे थे, आंसू बहा रहे थे, वही 24 घंटे बाद गुस्सा निकाल रहे हैं। गुस्सा इस बात का कि जिस कैंसर के बाद महिलाएं अपना जीवन गंवा बैठती हैं, उसके नाम पर पूनम ने अपने मौत की फर्जी कहानी गढ़ी थी। सिर्फ इसके लिए कि वह इस घातक बीमारी के बारे में जागरुक कर सकें। सोशल मीडिया पर लोग भड़के हुए हैं। ऋषि कपूर की बेटी रिद्धिमा कपूर ने कहा कि यह बेहद असंवेदनशील कैंपेन था। बहुत गिरा हुआ था। अरविंद तोंडे नामक यूजर ने लिखा कि जागरुकता ऐसी फैलाओ कि 4 लोग गाली दें। कई इंस्टा यूजर ने तो लिखा की पूनम आपको शर्म आनी चाहिए।

डॉक्टर क्यूटरस के नाम से मशहूर डॉक्टर तान्या ने भी पूनम का विरोध करते हुए कहा कि मुझे अपने इस घटिया जागरुकता अभियान से मत जोड़ो। मैं बहुत दिनों से इस सर्वाइकल कैंसर को लेकर दी जाने वाली वैक्सीन के लिए जागरुकता अभियान चला रही हूं। तब तक शायद आपके इस घटिया सोच का जन्म भी नहीं हुआ था। यह कदम बेहद असंवेदनशील था। जाने-माने फिल्मकार और इंडियन फिल्म एंड टीवी डायरेक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक पंडित ने कहा कि यह बहुत ही दुखद और चौंकाने वाला है। जिस तरह से एक एक्ट्रेस ने सर्वाइकल कैंसर के चलते अपनी मौत की खबर का एलान किया। उन्होंने लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है। ऑल इंडियन सिने वर्कर्स एसोसिएशन ने मॉडल पूनम पांडे और उनके मैनेजर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के लिए मुंबई के विक्रोली पुलिस स्टेशन के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक को पत्र लिखा है।

अब सर्वाइकल कैंसर क्या है और कैसे शरीर पर हमला कर उसे कमजोर कर देता है, समझते हैं। डॉक्टर के शब्दों में समझेंगे तो आसानी से बात समझ आ जाएगी। मशहूर गायनेकोलॉजिस्‍ट डॉ. शारदा जैन ने बताया कि सर्वाइकल कैंसर HPV मतलब ह्यूमन पैपिलोमा वायरस के कारण होता है। यह वायरस पहले महिला के शरीर में प्रवेश कर गर्भाशय के अंदर के हिस्से को संक्रमित करता है। यह इतनी खामोशी से अंदर घुसता है कि महिलाओं को इसका इल्म भी नहीं होता। शरीर में घुसते ही यह अपने आपको बढ़ाने लगता है। कैंसर का रूप ले लेता है। यह किसी भी उम्र में महिलाओं को अपना शिकार बना लेता है। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि 70 फीसदी महिलाओं में यह 30 साल में ही डायग्नोस हो जाता है। यह वायरस शारीरिक संपर्क बनाने की वजह से भी शरीर के अंदर घुस सकता है।

सर्वाइकल कैंसर से जुड़े आंकड़े डराते हैं। महिलाओं में हर तरह के कैंसर के मामले 18 फीसदी हैं। आंकड़े गवाह हैं कि भारत में हर साल 1 लाख 20 हजार महिलाएं सर्वाइकल कैंसर से पीड़िक हो जाती हैं। जिसमें 74 हजार महिलाएं दम तोड़ देती हैं। प्रतिदिन के हिसाब से बात करें तो हर दिन 211 महिलाएं इस जानलेवा कैंसर से अपनी जान गंवा देती हैं। जांच का भी हाल समझिए। देश में ऐसी 1 फीसदी महिलाएं ही हैं जो इस घातक कैंसर की जांच कराती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO ने बताया कि कम से कम 70 फीसदी महिलाओं की सर्वाइकल कैंसर की जांच होनी चाहिए।

पीएम नरेंद्र मोदी ने पिछले पांच वर्षों में केंद्र सरकार की सफलता के बारे में बात की.

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राम मंदिर निर्माण के बाद तीन तलाक की प्रथा समाप्त कर दी गई। महिलाओं को आरक्षण से लेकर दंड संहिता बिल पास. मौजूदा लोकसभा के आज आखिरी दिन आखिरी वक्ता के तौर पर बोलते हुए नरेंद्र मोदी ने सरकार की पांच साल की उपलब्धियां गिनाईं. विरोधियों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी के प्रचार के लिए लोकसभा के मंच का इस्तेमाल किया.

आमतौर पर पिछले दस सालों में जब भी मोदी ने लोकसभा या राज्यसभा को संबोधित किया है, विपक्ष पर हमला बोला है. आज मोदी थोड़ा अलग रास्ते पर चलते हैं. प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर हमला करने के बजाय शुरुआत से ही सरकार की सफलता की कहानी को उजागर करने की रणनीति अपनाई. मोदी ने पांच साल पहले सत्ता में आने पर कश्मीर का विशेष दर्जा रद्द कर दिया था। आज अपने भाषण में, जहां उन्होंने कश्मीर में ‘शांत’ स्थिति के बारे में बात की, वहीं मोदी ने महामारी के दौरान सरकार की भूमिका के बारे में भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा, ”इस सरकार के कई सुधार-उन्मुख निर्णय अभूतपूर्व हैं। कश्मीर के लोग सामाजिक न्याय से वंचित थे। यह सरकार उन्हें न्याय दिलाने में सक्षम है.

मोदी ने दावा किया कि भावी पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए महिला संरक्षण विधेयक, तीन तलाक का उन्मूलन या डेटा संरक्षण अधिनियम जैसे कदम उठाए गए हैं। तीन तलाक को लेकर मोदी ने कहा, ‘हालांकि कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को इसका लाभ नहीं मिल रहा है. लेकिन ये लोकसभा पीढ़ियों से मुस्लिम महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय को रोकने में सक्षम है.” इसके अलावा मोदी ने ब्रिटिश काल के कानूनों की जगह नए कानून लाने, कारोबार में सहूलियत, नई शिक्षा नीतियां, रिसर्च पर जोर देने की भी बात कही। उन्होंने कहा, ”दंड संहिता में कई अनावश्यक कानूनों को खत्म कर दिया गया है. व्यापार को सुविधाजनक बनाने के लिए कम से कम 60 कानूनों को निरस्त कर दिया गया है।

अंतरिम बजट सत्र आज खत्म हो गया. चुनाव आयोग कुछ ही दिनों में लोकसभा चुनाव का बिगुल बजा देगा. बीजेडी सांसद भर्तृहरि मोहताब के शब्दों में, “वार्षिक परीक्षा के दौरान चिंता यह होती है कि क्या सभी छात्र उत्तीर्ण होकर अगली कक्षा में जाएंगे या नहीं।” ऐसा माहौल अब लोकसभा में भी है.” कुछ सांसदों को चिंता सताने लगी है. मैं जितनी अधिक चुनौतियों का सामना करता हूँ, मैं भीतर से उतना ही मजबूत होता जाता हूँ। लोकतंत्र में चुनाव जरूरी है. मुझे लगता है कि हमारी चुनाव प्रणाली को देखकर दुनिया में इस देश के प्रति सम्मान बढ़ेगा।” वह बहस इस शहर में एक चर्चा बैठक में सामने आई। एक पक्ष का दावा है कि रामलला की प्राणप्रतिष्ठा का लाभ लोकसभा चुनाव में उम्मीद के मुताबिक गेरुआ खेमे को मिलेगा. दूसरे पक्ष का प्रतिदावा यह है कि आम लोगों के जीवन की अहम समस्याओं को छुपाने के लिए मंदिर को राजनीति के केंद्र में स्थापित किया जा रहा है!

एक यूट्यूब चैनल और एक संगठन के सहयोग से तथा जादवपुर विश्वविद्यालय के ‘सांस्कृतिक विविधता और कल्याण अध्ययन केंद्र’ के सहयोग से नजरूल भवन में ‘मंदिर और भारतीय राजनीति का भविष्य’ विषय पर एक चर्चा आयोजित की गई। वहीं, बीजेपी नेता स्वपन दासगुप्ता ने पूरे मामले को भारत की पहचान, हिंदू ‘वर्चस्व’ को फिर से हासिल करने का संघर्ष बताया। भाजपा के इस ”विश्वास” का कारण बताते हुए कि राम मंदिर की स्थापना से लोकसभा चुनाव में फायदा होगा, उन्होंने दावा किया, ”राम मंदिर की स्थापना ने लोगों के दिलों को छू लिया है।”

इसी बिंदु से कांग्रेस के वकील अरुणाभ घोष ने राम को राजनीतिक सशक्तिकरण का एक उपकरण बताने की कोशिश की. उनके शब्दों में, ”जो लोग राम की बात करते हैं, वे दरअसल सत्ता की ओर देखकर राम की बात कर रहे हैं. राम के प्रति प्रेम के कारण नहीं।” दूसरे पहलू में भी लगभग यही बयान तृणमूल प्रतिनिधि अरूप चक्रवर्ती का है. रामलला की ‘अधूरे मंदिर’ में स्थापना पर सवाल उठाते हुए उन्होंने बिना नाम लिए बीजेपी पर तंज कसा, “अगर चुनाव से पहले भगवान राम को नहीं बदला गया तो चुनाव से कोई फायदा नहीं होगा!”पत्रकार परंजॉय गुहाठाकुरता ‘नरम हिंदुत्व बनाम कठोर हिंदुत्व’ के बीच तुलना करते हैं। उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के ‘हनुमान चालीसा’ पढ़ने या मध्य प्रदेश चुनाव से पहले कमल नाथ की मंदिर-यात्रा जैसे ‘नरम हिंदुत्व’ के उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा, ”हम सोचते हैं कि कट्टर और नरम हिंदुत्व के बीच लड़ाई में, कट्टर हिंदुत्व हमेशा रहेगा जीतना।”

संसद में अयोध्या राम मंदिर पर बातचीत में बीजेपी नेतृत्व ने पीएम नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की

सीधे तुलना ही नहीं, शाह ने लोकसभा में बताया, मोदी में हैं राम के सारे गुण! संसद के दोनों सदनों में बीजेपी समेत सत्ता पक्ष के सांसदों ने राम का गुणगान किया. दिल्ली से गायक-सांसद हंस राज ने भी लोकसभा में हंस राम का भजन गाया. वह ‘सर्वव्यापी’ है. वह ‘प्रजावत्सल’ है। वह एक ‘हीरो’ हैं. वह एक ‘अच्छे शासक’ हैं. उन्होंने न सिर्फ नरेंद्र मोदी की तुलना सीधे तौर पर राम से की. भले ही उन्होंने ऐसा नहीं किया, लेकिन आज अमित शाह ने लोकसभा में खड़े होकर बताया कि राम के सारे गुण नरेंद्र मोदी में हैं. ऐसे ‘सर्वगुण संपन्न’ प्रधानमंत्री का इंतजार पूरा देश कई वर्षों से कर रहा था. और इसलिए राम मंदिर का निर्माण और राम लला की प्राण प्रतिष्ठा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के बिना संभव नहीं थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन करने और राम लला को विराजमान करने के बाद सवाल उठा कि क्या भारत ने बहुलवाद और तानाशाही की राह पर एक और कदम बढ़ा दिया है?

अमित शाह ने आज संसद में खड़े होकर दलील दी कि दुनिया के किसी भी देश में बहुसंख्यक समुदाय ने अपने धर्म के लिए इतना लंबा इंतजार नहीं किया है. इसने भारत के ‘लोकतांत्रिक मूल्यों’ और ‘धर्मनिरपेक्ष चरित्र’ को पूरी दुनिया के सामने स्थापित किया है। राम मंदिर के लिए संघर्ष 1528 से शुरू हुआ. 1858 से कानूनी लड़ाई शुरू हुई. वह संघर्ष 22 जनवरी को राम मंदिर के उद्घाटन और राम लला के निधन के साथ समाप्त हुआ। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के फैसले के बाद ‘सौहार्दपूर्ण माहौल’ में राम मंदिर का निर्माण हुआ.

लोकसभा चुनाव से पहले शनिवार को संसद सत्र का आखिरी दिन था. उसी दिन, समझदार भाजपा नेतृत्व ‘ऐतिहासिक राम मंदिर के निर्माण और राम लला की मृत्यु’ पर चर्चा के लिए लोकसभा और राज्यसभा में एक प्रस्ताव लाया। इसका उद्देश्य संसद के अंदर राम मंदिर के आसपास की भावना को लाना और मोदी सरकार की सफलता के रूप में राम मंदिर की स्थापना पर संसद की मुहर लगवाना था। बीजेपी नेताओं को पता था कि विपक्ष राम मंदिर निर्माण का विरोध नहीं कर सकता.

संसद के दोनों सदनों में बीजेपी समेत सत्ता पक्ष के सांसदों ने राम का गुणगान किया. दिल्ली से गायक-सांसद हंस राज ने भी लोकसभा में हंस राम का भजन गाया. उस पर सभी ने ताली बजाई। बीजेपी सांसदों ने राम मंदिर के लिए नरेंद्र मोदी को बधाई दी. और उनके जरिए राम मंदिर की स्थापना की चर्चा दरअसल नरेंद्र मोदी को ‘सर्वगुण संपन्न’ शासक के रूप में स्थापित करने का मंच बन गई है. लोकसभा में इसका नेतृत्व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और राज्यसभा में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने किया। अमित शाह ने आज लोकसभा में कहा कि चैतन्यदेव और रामानंद जैसे अनेक लोगों ने इस देश में भक्ति आंदोलन किया है. इससे देश मजबूत हुआ. पारंपरिक धर्म के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ा है. भक्ति आंदोलन ने जन-जन को दिशा दिखाई है। परंतु भारत के हजारों वर्षों के सांस्कृतिक एवं राजनीतिक इतिहास में किसी अन्य शासक या जन-प्रतिनिधि ने भक्ति भावना के पुनरुद्धार का इस प्रकार नेतृत्व नहीं किया। राम मंदिर के भूमि पूजन से लेकर मंदिर निर्माण और राम लला की प्राण प्रतिष्ठा तक जो काम नरेंद्र मोदी ने किया है. उन्होंने कहा, ”लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर को लेकर जनजागरण किया. नरेंद्र मोदी ने भक्ति की भावना जगाई है.” अमित शाह ने उस दिन संसद में बताया, मोदी ने भारत में एक राजा और ऋषि की तरह आध्यात्मिक चेतना जगाई है. यहां अमित शाह ने राम मंदिर आंदोलन के सफर और कानूनी लड़ाई की तुलना की. प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के दस साल. तर्क दिया, मोदी ने एक अच्छे शासक की तरह कोविड महामारी के दौरान नेतृत्व किया। बासठ वर्षों तक जब चीन ने आक्रमण किया तो उसे एक वीर की भाँति रोका गया। जब पुंछ से पुलवामा पर हमला हुआ तो मोदी ने पाकिस्तान के घर में घुसकर जवाब दिया. यह देखकर कि छात्र दबाव में आकर आत्महत्या करना पसंद कर रहे हैं, ‘प्रजावत्सल’ नरेंद्र मोदी ने अपने पिता की तरह उनके साथ ‘परीक्षा का अभ्यास’ किया। अमित शाह के भाषण के दौरान लोकसभा में बार-बार ‘जय श्री राम’ के नारे लगे.

शाह ने कहा, मोदी के नेतृत्व के बिना राम मंदिर की स्थापना संभव नहीं होती. क्योंकि कई लोगों को राम मंदिर के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देश में खून-खराबे और हिंसा की आशंका थी. प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को जीत-हार के नजरिये से नहीं देखा. देश की 1.4 अरब जनता के प्रतिनिधि के तौर पर उन्होंने राम मंदिर और राम लला का भूमि पूजन किया है. इसलिए ‘जय श्री राम’ का मंत्र, जो राम मंदिर आंदोलन के दौरान रामायण की वानर सेना का युद्ध मंत्र था, राम मंदिर के उद्घाटन पर भक्ति के मंत्र ‘जय सियाराम’ में बदल गया। कांग्रेस-एनसीपी जैसे विपक्षी दलों के नेताओं ने आज कहा कि बीजेपी अकेले राम की प्रशंसक नहीं है. हर कोई राम का भक्त है. मोदी ने सरकार की सफलता पर सवाल उठाए लेकिन वे विवाद में नहीं पड़ना चाहते थे. लेकिन एमआईएम नेता असदुद्दीन वैसी ने कहा, जहां राम मंदिर बना है, वहां बाबरी मस्जिद थी, है और रहेगी. उन्होंने लोकसभा में ‘बाबरी मस्जिद जिंदाबाद’ का नारा भी लगाया. अमित शाह ने विपक्ष से कहा कि विपक्ष को यज्ञ में बाधा डाले बिना इस आध्यात्मिक जागृति के साथ चलना चाहिए. इसी में देश की भलाई है. क्योंकि राम मंदिर की स्थापना एक नये युग की शुरुआत है. 2024 में फिर बनेगी नरेंद्र मोदी सरकार. उसके बाद विकसित भारत की ओर यात्रा शुरू होगी। शाह ने राम मंदिर को कट्टरता के सामने आध्यात्मिकता के प्रतीक के रूप में रेखांकित किया है। बीजेपी नेताओं ने लगाए नारे, इस बार वेसी भी बोलें ‘जय श्री राम’!

ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर ग्लेन मैक्सवेल ने अपना पांचवां टी20 शतक लगाया.

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ग्लेन मैक्सवेल ने रोहित शर्मा का वर्ल्ड रिकॉर्ड साझा किया. उन्होंने वेस्टइंडीज के खिलाफ टी20 में शतक लगाया. मैक्सवेल ने पिछले तीन टी20 मैचों में दो शतक लगाए. उनके नाम अब टी20 क्रिकेट में पांच शतक हो गए हैं. रोहित के समान. मैक्सवेल एडिलेड में वेस्टइंडीज के खिलाफ आक्रामक मूड में थे. उन्होंने शुरुआत से ही बड़े शॉट खेलना शुरू कर दिया. उन्होंने महज 55 गेंदों पर 120 रनों की नाबाद पारी खेली. 12 चौके और 8 छक्के लगाए. मैक्सवेल के दम पर ऑस्ट्रेलिया ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 4 विकेट पर 241 रन बनाए. यह टी-20 में वेस्टइंडीज के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया का सबसे ज्यादा रन है। टी20 वर्ल्ड कप जून में शुरू होगा. उससे पहले मैक्सवेल की फॉर्म ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटरों के चेहरे पर मुस्कान ला देगी. इससे पहले टी20 में सबसे ज्यादा शतक रोहित के नाम थे. उन्होंने 151 मैचों में पांच शतक लगाए. मैक्सवेल ने 103 मैचों में पांच शतक लगाए। इस लिस्ट में अगला नाम सूर्यकुमार यादव का है। उन्होंने 60 मैचों में चार शतक लगाए. बाबर आजम के नाम 109 मैचों में तीन शतक हैं. पिछले साल वनडे वर्ल्ड कप के दौरान भी मैक्सवेल फॉर्म में थे। उन्होंने भारतीय धरती पर अफगानिस्तान के खिलाफ दोहरा शतक लगाया था. मैक्सवेल ने ऑस्ट्रेलिया को विश्व कप जिताने में अहम भूमिका निभाई. वह उस फॉर्म को टी20 वर्ल्ड कप में भी बरकरार रखना चाहते हैं. मैक्सवेल यही कर रहे हैं. जलसा में शराब पीने के बाद ग्लेन मैक्सवेल को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर के मामले में वहां के बोर्ड ने जांच शुरू कर दी है. बुधवार को उनकी टी20 टीम में वापसी हुई. इसके बाद कोच ने सख्त संदेश देते हुए कहा कि मैक्सवेल को भविष्य में ऐसी हरकतें न करने की चेतावनी दी गई है.

ऑस्ट्रेलिया ने वेस्टइंडीज के खिलाफ 14 सदस्यीय टीम का ऐलान कर दिया है. मिशेल स्टार्क, पैट कमिंस और स्टीव स्मिथ को आराम दिया गया है। टीम का नेतृत्व मिचेल मार्श करेंगे. वे इस सीरीज को टी20 वर्ल्ड कप की तैयारी के तौर पर देख रहे हैं. मुख्य चयनकर्ता जॉर्ज बेली ने कहा, ”यह सीरीज हमें बताएगी कि टी20 वर्ल्ड कप में किसे लेना है.”

कोच एंड्रयू मैकडोनाल्ड ने मैक्सवेल के बारे में कहा, “मैंने ग्लेन से बात की है। बहुत अच्छी चर्चा. यह देखना हमारा कर्तव्य है कि वह अपना ख्याल रखे।’ हमने उसे टीम में शामिल होने के लिए आराम और पुनर्वास का समय दिया। लेकिन मुझे लगता है कि ये घटना उनके लिए एक अच्छा सबक है. आपको यह समझना होगा कि आपके लिए सबसे अच्छा क्या है। तुम्हें भी अपना ख़याल रखना चाहिए। मैक्सवेल आस्ट्रेलियाई सफेद गेंद क्रिकेट का अहम हिस्सा हैं। मुझे नहीं पता कि वह 2027 विश्व कप में नजर आएंगे या नहीं।’ लेकिन अगर वह खेलना चाहता है तो उसे सोचना होगा।’ एक ऑस्ट्रेलियाई दैनिक के मुताबिक, मैक्सवेल पिछले हफ्ते एडिलेड में एक कॉन्सर्ट में गए थे और शराब पी थी। देर रात उन्हें एंबुलेंस से अस्पताल में भर्ती कराया गया। कुछ समय तक इलाज चला. हालाँकि, वह उस रात अस्पताल में नहीं रुके। बताया गया कि उन्होंने अगले दिन से अभ्यास शुरू कर दिया।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस कॉन्सर्ट में ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज के बाकी क्रिकेटरों को भी आमंत्रित किया गया था. लेकिन मैक्सवेल उनके साथ नहीं गये. अकेले गए पूर्व ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर ब्रेट ली के बैंड ‘सिक्स एंड आउट’ ने वहां परफॉर्म किया. बाद में मैक्सवेल को रॉयल एडिलेड अस्पताल में भर्ती कराया गया। क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने एक बयान में कहा कि बोर्ड को मैक्सवेल के साथ हुई घटना की जानकारी है. अधिक जानकारी के लिए खोज रहे हैं. लेकिन इसका वनडे सीरीज से बाहर होने से कोई लेना-देना नहीं है.’ बीबीएल के प्रदर्शन और भविष्य के सितारों को लाने को ध्यान में रखते हुए मैक्सवेल को बरकरार नहीं रखा गया। मालूम हो कि वह टी20 सीरीज में वापसी कर सकते हैं.

मैक्सवेल ने आखिरी प्रतिस्पर्धी मैच 15 जनवरी को खेला था. कुछ दिन पहले उन्होंने मेलबर्न स्टार्स का कप्तान पद छोड़ दिया था. होबार्ट ने हरिकेन के विरुद्ध खेला। उन्होंने शुरुआत से ही बड़े शॉट खेलना शुरू कर दिया. उन्होंने महज 55 गेंदों पर 120 रनों की नाबाद पारी खेली. 12 चौके और 8 छक्के लगाए. मैक्सवेल के दम पर ऑस्ट्रेलिया ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 4 विकेट पर 241 रन बनाए. यह टी-20 में वेस्टइंडीज के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया का सबसे ज्यादा रन है। टी20 वर्ल्ड कप जून में शुरू होगा. उससे पहले मैक्सवेल की फॉर्म ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटरों के चेहरे पर मुस्कान ला देगी. इससे पहले टी20 में सबसे ज्यादा शतक रोहित के नाम थे.

दिल्ली कोर्ट ने कोरोना मरीज की कार्डियक अरेस्ट से मौत का दावा करने पर सरकार को फटकार लगाई.

दिल की बीमारी से हुई कोरोना मरीज की मौत! कोर्ट ने सरकार की दलील नहीं मानी, राज्य सरकार ने मृत्यु प्रमाण पत्र को ‘साधन’ के तौर पर इस्तेमाल कर मुआवजा देने से इनकार कर दिया. मृतक की पत्नी का दावा है कि उनकी मौत दिल की बीमारी से नहीं बल्कि कोरोना से हुई है. एक महिला को तीन साल बाद ‘न्याय’ मिला। कोरोना के दौरान उन्होंने अपने पति को खो दिया. लेकिन सरकार से मुआवजा नहीं मिला. सरकार ने तर्क दिया कि मृतक की मौत कोरोना से नहीं हुई. उनकी मृत्यु हृदय रोग से हुई। महिला को कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा. जज ने उस मामले में दिल्ली सरकार की भूमिका पर असंतोष जताया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक याचिकाकर्ता के पति की 19 जून 2021 को अस्पताल में मौत हो गई. इससे पहले उनका दो महीने तक अस्पताल में इलाज चला था. इलाज के दौरान वह कोरोना से संक्रमित हो गए थे. लेकिन शारीरिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ. लेकिन डेथ सर्टिफिकेट में लिखा गया कि उनकी मौत कोरोना से नहीं बल्कि दिल की बीमारी से हुई है.
कथित तौर पर राज्य सरकार ने इस सर्टिफिकेट को ‘टूल’ की तरह इस्तेमाल कर मुआवजा देने से इनकार कर दिया. मृतक की पत्नी ने दावा किया कि उसका पति परिवार का एकमात्र कमाने वाला था। उनकी मौत दिल की बीमारी से नहीं बल्कि कोरोना से हुई है. महिला ने उस शिकायत के आधार पर दिल्ली हाई कोर्ट में केस दायर किया. हाईकोर्ट में काफी समय तक मामला चला। हाल ही में जस्टिस सुब्रह्मण्यम प्रसाद की बेंच ने इस मामले में फैसला सुनाया. फैसले के दौरान जज ने कहा, ”मृतक की मेडिकल जानकारी से यह स्पष्ट है कि वह कोरोना से संक्रमित था.” उपचार से कोई शारीरिक स्थिति में सुधार नहीं हुआ। अस्पताल में उनकी मौत हो गई. तथ्य यह है कि मृत्यु प्रमाण पत्र में हृदय रोग का उल्लेख है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह कोविड की जटिलताओं से पीड़ित नहीं थे।” कोरोना से मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मृतक के परिवार को कम से कम 50,000 रुपये देने को कहा। शीर्ष अदालत ने कहा कि कोरोना से मरने वालों के परिवारों को मुआवजा देना सरकार की जिम्मेदारी है. कोविड से मरने वालों के परिजनों को राज्य सरकार के आपदा राहत कोष से मुआवजा दिया जाये. यह राज्य की किसी भी जनकल्याणकारी योजना के अंतर्गत आएगा। सुप्रीम कोर्ट ने 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है लेकिन राज्य सरकार चाहे तो ज्यादा मुआवजा दे सकती है. जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के 2021 के आदेश का जिक्र किया. कोरोना संक्रमण से बचने के लिए अपने चेहरे को मास्क से ढकें, घबराएं नहीं, सीएम ममता की सलाह
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य के निजी अस्पतालों को कोरोना वायरस फैलने के खिलाफ चेतावनी दी है. उनके मुताबिक, निजी अस्पतालों में आईसीसीयू को अच्छे से साफ करने की जरूरत है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य के लोगों को मास्क पहनने की सलाह दी. देश के कई राज्यों से लगातार कोविड संक्रमण की खबरें आ रही हैं. कोरोना के नए वैरिएंट JN.1 ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों में कई कोविड मरीजों में यह स्वरूप पाया गया है। मुख्यमंत्री ने याद दिलाते हुए सावधान रहने की सलाह दी. गुरुवार को नवान्न में प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में ममता ने कोविड का विषय उठाया. उन्होंने कहा, ”हमें कोविड को लेकर थोड़ा सावधान रहना होगा. हम कोई आधिकारिक दिशानिर्देश जारी नहीं कर रहे हैं. लेकिन जो लोग मास्क पहन सकते हैं। कई बाहर से आते हैं. हमें नहीं पता कि बीमारी कौन ला रहा है. इसलिए हमें यथासंभव सावधान रहना होगा.” मुख्यमंत्री ने कोरोना वायरस फैलने के मामले में राज्य के निजी अस्पतालों को चेतावनी दी है. उनके मुताबिक, निजी अस्पतालों में आईसीसीयू को अच्छे से साफ करने की जरूरत है. वहां से संक्रमण फैलने की आशंका ज्यादा है. ममता ने कहा, ”कोविड निजी नर्सिंग होम में आईसीसीयू से फैल रहा है। मैं उन्हें दोष नहीं देता. इतने सारे मरीज़ तनावग्रस्त होते हैं, उन्हें ठीक से सफाई करने का मौका नहीं मिल पाता है। सरकारी अस्पतालों की प्रतिदिन सफाई होती है। मैं निजी अस्पतालों को आईसीसीयू को साफ रखने के लिए कहूंगा। हालांकि, मुख्यमंत्री को अभी कोरोना के वापस आने की संभावना नहीं दिख रही है. उनके शब्दों में, ”घबराने की कोई वजह नहीं है. अमेरिका, स्पेन में संक्रमण बढ़ रहा है. हमने इस बीमारी से अपने कई प्रियजनों को खोया है। शायद अब मृत्यु दर कम है. लेकिन यह बीमारी अत्यधिक संक्रामक है। इसलिए हमें अभी से सावधान रहना होगा.”