Home Blog Page 823

आखिर देश भर में कैसा है मौसम का मिजाज ?

आज हम आपको देश भर में मौसम का मिजाज बताने जा रहे हैं! पहाड़ों में हो रही बर्फबारी के बाद देशभर में एक बार फिर से मौसम करवट बदल रहा है। मौसम विभाग ने जम्मू- कश्मीर के साथ ही लद्दाख में तेजी बारिश और बर्फबारी का अनुमान जताया है। वहीं मैदानी इलाकों में भी आंधी- तूफान की चेतावनी जारी की है। जिसका असर दिल्ली में आज दोपहर से ही दिखने लगा है। पिछले कुछ दिनों से दिख रही खिली धूप आज दोपहर बाद अचानक बादलों के पीछे छिप गई है। बता दें कि मौसम का ये लुका छुपी का खेल उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक चल रहा है।  मौसम विभाग बीते कुछ दिनों से दिल्ली में हल्की बारिश के आसार बता रहा है और आज राजधानी के मौसम ने अपना रंग भी दिखाना शुरू कर दिया है। आज दोपहर बाद से अचानक ही तेज चमक रहे सूरज देव बादलों में जाकर छिप गए। जिसके कारण इस वक्त दिल्ली के कई इलाकों में हल्के बादल छा गए हैं। आज के दिन के लिए मौसम विभाग ने पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि आज यानी 25 फरवरी रविवार को आसमान में बादल छाए रहेंगे और दोपहर के बाद मौसम विभाग की भविष्यवाणी सत्य होती दिख रही है। वहीं मौसम विभाग ने हल्की बारिश की भी संभावना जताई है। ऐसे में रात तक दिल्ली के कुछ इलाकों में हल्की बूंदाबांदी भी पड़ सकती है। जिसके कारण तापमान में कमी आएगी। वहीं अगर अगले दो दिन के मौसम की बात करें तो राजधानी में अगले दो दिनों तक बारिश के आसार हैं। कुछ इलाकों में हल्की बूंदाबांदी पड़ सकती है। हालांकि मौसम के इस फेरबदल से दिल्ली के प्रदूषण में भी कमी आएगी।

जम्मू एवं कश्मीर में अगले 24 घंटों के दौरान मौसम बारिश का ही बना रह सकता है। मौसम विभाग ने यहां मंगलवार से खराब मौसम की भविष्यवाणी की है।मौसम विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि 27 फरवरी को जम्मू-कश्मीर में आमतौर पर बादल छाए रहेंगे और हल्की बारिश/बर्फबारी की संभावना है, जबकि 28 फरवरी से 3 मार्च तक ज्यादा बारिश की संभावना है। आज श्रीनगर में न्यूनतम तापमान 0.5, गुलमर्ग में माइनस 10 और पहलगाम में माइनस 6 डिग्री रहा। लद्दाख क्षेत्र के लेह शहर में न्यूनतम तापमान माइनस 14.2, कारगिल में माइनस 18.1 और द्रास में माइनस 17.4 डिग्री रहा। जम्मू शहर में न्यूनतम तापमान 8.9, कटरा में 5.5, बटोटे में माइनस 0.5, भद्रवाह में माइनस 1.2 और बनिहाल में माइनस 1.4 डिग्री रहा।

हिमाचल प्रदेश के लोकप्रिय पर्यटन स्थल मनाली और डलहौजी में शनिवार को ताजा बर्फबारी हुई। जिसके कारण शहर और आसपास के इलाकों में बर्फबारी के साथ बर्फीली हवाएं भी चलीं। हिमाचल प्रदेश में कड़ाके की ठंड से जूझ रहे लोगों को कोई राहत नहीं मिली है।मौसम विभाग कार्यालय ने 26, 27 और 29 फरवरी के अलावा एक मार्च को कुछ स्थानों पर गरज के साथ बारिश और बिजली गिरने का ‘येलो अलर्ट’ भी जारी किया है। वहीं कुछ इलाकों में इन तीन दिनों में ताजा बर्फबारी भी हो सकती है। जिसके कारण अभी कंपकपाने वाली ठंड से कोई राहत की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

मौसम विभाग के अनुसार 26 फरवरी यानी सोमवार को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के अलग- अलग हिस्सों में मौसम काफी बिगड़ सकता है। IMD ने इन राज्यों में तेज आंधी- तूफान, बारिश के साथ ही ओलावृष्टि होने की चेतावनी जारी की है। बता दें कि छत्तीसगढ़ में तो शनिवार से ही मौसम बिगड़ा हुआ है और वहां पर ओले गिरे हैं। बता दें कि दिल्ली के फरवरी माह की शुरूआत ही बारिश से हुई लेकिन बाद में मौसम शुष्क ही रहा। अब 19 फरवरी को एक बार फिर मौसम करवट लेने वाला है। कमजोर पड़ रहे ठंड के तेवर भी थोड़ा बढ़ सकते हैं। आईएमडी ने 19 फरवरी शाम से ही मौसम बदलाव के संकेत दिए हैं। दिल्लीवालों को बारिश के साथ आंधी देखने को मिलेगी। इससे ठंड भी बढ़ेगी। तापमान की बात करें तो अधिकतम तापमान 26 डिग्री तो न्यूनतम तापमान 11 डिग्री तक जा सकता है। हवाओं की गति इस दौरान 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे के आसपास रहेगी। 20 और 21 फरवरी को भी बादल छाए रहेंगे लेकिन बारिश नहीं होगी। मौसम 22 फरवरी के बाद ही साफ होगा।

18 फरवरी को अधिकतम तापमान 27 डिग्री तो न्यूनतम तापमान 9 डिग्री रह सकता है। 19 फरवरी को आंधी के साथ बारिश का अनुमान है। 20 फरवरी को भी बादल छाए रहेंगे। इस दौरान अधिकतम तापमान 22 तो न्यूनतम तापमान 11 डिग्री रहेगा। 21 फरवरी को भी कमोबेश यही स्थिति रहेगी। 22 और 23 फरवरी को मौसम साफ रहेगा। अधिकतम तापमान 24-25 तो न्यूनतनम 9 डिग्री तक जाएगा। दिल्ली में बारिश और आंधी के बाद पहाड़ी राज्यों का भी मौसम बदलेगा। मौसम विभाग ने बर्फबारी की संभावना जताई है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में 19 से 21 फरवरी तक भारी बर्फबारी की संभावना जताई गई है। ऐसे में पर्यटकों के लिए ये तीन दिन अनुकूल हो सकते हैं। पंजाब-हरियाणा 19 से 21 फरवरी के बीच गरज-चमक के साथ बारिश हो सकती है। पूर्वी-पश्चिमी यूपी और पूर्वी-पश्चिमी राजस्थान में भी कमोबेश ऐसा ही मौसम रहने वाला है।

क्या बंगाल और महाराष्ट्र के साथ गठबंधन बना पाएगी कांग्रेस?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कांग्रेस महाराष्ट्र और बंगाल के साथ गठबंधन बना पाएगी या नहीं! आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस अलग-अलग राज्यों में सहयोगियों के साथ गठबंधन में जुटी है। आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस की बात बन चुकी है। दोनों ही दलों के साथ अलग-अलग राज्यों में सीट शेयरिंग का फॉर्मूला सामने भी आ चुकी है। बावजूद इसके पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में अभी भी कांग्रेस की मुश्किलें कम होती नजर नहीं आ रहीं। दोनों ही राज्यों में कांग्रेस नेतृत्व को मन मुताबिक डील नहीं मिल पा रही। जानकारी के मुताबिक, बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के साथ सीटों के बंटवारे पर सहमति नहीं बन पाई है। महाराष्ट्र में भी कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी के बीच सीटों के बंटवारे पर गतिरोध नजर आ रहा। यही वजह है कि यूपी में समाजवादी पार्टी और दिल्ली, हरियाणा, गुजरात में आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन करने के बावजूद, कांग्रेस आलाकमान की चुनौतियां कम होती नजर नहीं आ रहीं। बंगाल में कांग्रेस की कोशिश तृणमूल कांग्रेस को फिर से बातचीत की टेबल पर लाने की है। टीएमसी चीफ और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि वह कांग्रेस के साथ सीटों के बंटवारे की असफल वार्ता के बाद अकेले चुनाव लड़ेंगी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि अधीर रंजन चौधरी के नेतृत्व वाली राज्य कांग्रेस इकाई ने लगभग 10 सीटों की मांग की थी। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस ने केवल दो सीट की ही पेशकश की थी। ममता बनर्जी की अधीर रंजन चौधरी ने आलोचना की थी, जिसके बाद, उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने उनके सभी प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया है। हालांकि, राहुल गांधी सहित कांग्रेस आलाकमान अब भी ममता बनर्जी को गठबंधन में वापस लाने के प्रयास कर रहा है।

हालांकि, अब तक की सूचना के मुताबिक कांग्रेस-टीएमसी में सीटों के बंटवारे पर सहमति नहीं बन पाई है। अधीर रंजन चौधरी लगातार तृणमूल पर निशाना साध रहे हैं। उनका दावा है कि कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर टीएमसी के भीतर मतभेद हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी दुविधा में है, कुछ सदस्यों का मानना है कि अगर वे अकेले चुनाव लड़ते हैं, तो पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक उनके खिलाफ मतदान करेंगे। पार्टी के एक अन्य वर्ग को डर है कि अगर वे बंगाल में गठबंधन को प्राथमिकता देते हैं, तो मोदी सरकार उनके खिलाफ जांच एजेंसियों का इस्तेमाल करेगी। इसी खींचतान के चलते ममता बनर्जी बंगाल में राहुल गांधी की अगुवाई वाली भारत जोड़ो न्याय यात्रा में शामिल नहीं हुईं। इससे गठबंधन को बीजेपी के हमलों का मुकाबला करने का मौका नहीं मिला।

महाराष्ट्र की बात करें तो कांग्रेस, शिवसेना और शरद पवार के नेतृत्व वाले एनसीपी के धड़े से मिलकर बने इंडिया ब्लॉक ने अभी तक सीट बंटवारे पर कोई पत्ते नहीं खोले हैं। खबरों के मुताबिक, राहुल गांधी ने गतिरोध को सुलझाने के प्रयास में शिवसेना के नेता उद्धव ठाकरे से बात की है। कांग्रेस का लक्ष्य मुंबई की छह लोकसभा सीटों में से तीन पर चुनाव लड़ना है। उधर, उद्धव ठाकरे राज्य में 18 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहते हैं, जिसमें मुंबई की चार सीटें शामिल हैं। इसी गतिरोध को खत्म करने और बीच रास्ता खोजने के लिए दोनों नेताओं ने चर्चा की है।

कांग्रेस को महाराष्ट्र में तीन वरिष्ठ नेताओं के बाहर होने से भी झटका लगा है। हालांकि, राज्य कांग्रेस प्रमुख नाना पटोले ने जोर देकर कहा है कि गठबंधन के भीतर कोई विवाद नहीं है। आगामी चुनावों में महा विकास अघाड़ी अच्छा प्रदर्शन करेगा। महाराष्ट्र में इंडिया ब्लॉक के लिए एक चुनौती शिवसेना और एनसीपी के नए पार्टी नाम और सिंबल के बारे में वोटरों को बताना भी है। एक बार सीटों का बंटवारा तय हो जाने के बाद, तीनों दलों को बीजेपी को चुनौती देने के लिए संयुक्त अभियान शुरू करने की आवश्यकता होगी। इस तरह से महाराष्ट्र में अगर सीट सीट शेयरिंग फॉर्मूला बन भी जाता है तो भी इंडिया गठबंधन को इस चुनाव में काफी मेहनत करनी होगी।

उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया है। सूबे की 80 लोकसभा सीटों में से 17 सीटें कांग्रेस को मिली हैं, बाकी सीट सपा के खाते में गई है। वहीं कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में समाजवादी पार्टी को एक सीट दी है। कांग्रेस ने दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, चंडीगढ़ और गोवा के लिए आम आदमी पार्टी के साथ सीटों के बंटवारे पर भी सहमति जताई है। हालांकि, पंजाब में दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे क्योंकि वहां बातचीत सफल नहीं हो सकी।

जानिए कैसा हुआ था देश का पहला संसदीय चुनाव?

आज हम आपको बताएंगे कि देश का पहला संसदीय चुनाव कैसा हुआ था! इस साल लोकसभा के 18वें आम चुनाव की तैयारी पूरे देश में जोर-शोर से चल रही है। सभी सियासी पार्टियां इस चुनाव को लेकर प्लानिंग में जुटी हैं। इन सबके बीच क्या आपको पता है देश का पहला संसदीय चुनाव कब हुआ था। कितनी सीटों पर वोटिंग हुई थी। देश का पहला संसदीय चुनाव 1951-52 में हुआ था। नवोदित भारतीय गणतंत्र ने 1951-52 के चुनाव की विभिन्न चुनौतियों को पार करते हुए और कई आलोचकों को गलत साबित किया। इस अभूतपूर्व लोकतांत्रिक प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरा किया गया था। ये चुनाव ऐसे समय हुए जब देश के बंटवारे का जख्म भरा नहीं था। उस समय बड़ी संख्या में मतदाता निरक्षर थे। आजादी के बाद भारत निर्वाचन आयोग ने लोकसभा की 489 सीट के लिए देश का पहला संसदीय चुनाव कराया था। उस समय आयोग बने बमुश्किल एक ही साल हुआ था। पहले लोकसभा चुनाव में 17 करोड़ 30 लाख मतदाताओं ने 1,874 उम्मीदवारों में से अपने प्रतिनिधियों का चयन किया था। इस साल लोकसभा के 18वें आम चुनावों की तैयारी में लगे निर्वाचन आयोग पर 1950 के दशक में जनसांख्यिकीय, भौगोलिक और साजो सामान संबंधी चुनौतियों का सामना करते हुए चुनाव कराने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी। पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एसवाई कुरैशी ने कहा कि 1951-52 का पहला आम चुनाव उस समय भी दुनिया में हुई सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया थी। उन्होंने कहा कि सुकुमार सेन भारत के पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सलाम है जिन्होंने पहला आम चुनाव कराया और बेहतरीन प्रदर्शन किया। इतनी व्यापक प्रक्रिया को किसी पूर्व अनुभव के बिना सम्पन्न किया गया जिसके लिए पहले से कोई बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं था।

एसवाई कुरैशी ने कहा कि भारत ने वास्तव में ‘एक बेहतरीन प्रयोग’ किया था जैसा कि उस समय फिल्म प्रभाग की ओर से चुनाव पर निर्मित एक शॉर्ट वीडियो में दिखाया गया था। इस वीडियो में यह भी उल्लेख किया गया था कि चुनाव की वास्तविक प्रक्रिया से पहले ‘मॉक इलेक्शन’ यानी अभ्यास चुनाव कराए गए थे। आयोग की ओर से प्रकाशित ‘जनरल इलेक्शंस 2019: एन एटलस’ के अनुसार, पहले चुनाव की प्रक्रिया 25 अक्टूबर, 1951 को शुरू हुई और यह चार महीने तक चली। इस दौरान 17 दिन मतदान हुआ था। यह प्रक्रिया शुरू करने से पहले मतदाता सूची तैयार करते समय आयोग को चौंकाने वाली बात पता चली। उन्होंने पाया कि कुछ राज्यों में बड़ी संख्या में महिला वोटरों का रजिस्ट्रेशन ‘उनके अपने नाम से नहीं’ था। बल्कि उनके परिवार के पुरुष सदस्यों के साथ उनके संबंधों के विवरण के आधार पर किया गया था। जैसे अमुक व्यक्ति की मां या पत्नी आदि। स्थानीय प्रचलन के अनुसार, इन इलाकों में महिलाएं अजनबियों को अपना नाम बताने से कतराती थीं।

पहले आम चुनावों पर 1955 में प्रकाशित आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, उस समय निर्देश जारी किए गए थे कि वोटर्स का नाम उसकी पहचान का एक अनिवार्य हिस्सा है। ऐसे में इसे मतदाता सूची में शामिल किया जाना चाहिए। उस समय लोगों में जागरूकता बढ़ाई गई और मतदाताओं का असल नाम जोड़ने के लिए चुनाव कराने की अवधि को विशेष रूप से बढ़ाया गया। रिपोर्ट में कहा गया कि देश में कुल लगभग आठ करोड़ महिला मतदाताओं में से लगभग 20 से 80 लाख महिलाओं ने अपने असल नाम की जानकारी नहीं दी। इसके कारण उनसे संबंधित प्रविष्टियों को मतदाता सूची से हटाना पड़ा। ऐसे सभी मामले बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य भारत, राजस्थान और विंध्य प्रदेश राज्यों में सामने आए थे।

दिल्ली के पूर्व मुख्य निर्वाचन अधिकारी सीईओ चंद्र भूषण कुमार ने कहा कि उस समय महिला मतदाताओं से मतदाता सूची में अपना नाम घोषित करने के लिए कहना आयोग का एक बहुत ही उल्लेखनीय रुख था। उन्होंने कहा कि उस दौरान तय की गई बहुत सी चीजें ‘हमारी पूरी चुनावी प्रक्रिया का अभिन्न अंग’ बन गई हैं। चाहे यह चुनाव चिह्न हों या अमिट स्याही का इस्तेमाल हो।

पूरे देश में 1,96,084 मतदान केंद्र स्थापित किए गए थे। मतदान की प्रक्रिया बर्फबारी के मौसम से पहले हिमाचल प्रदेश से शुरू की गई थी। रिपोर्ट में कहा गया कि आयोग को इस राष्ट्रव्यापी प्रक्रिया के दौरान उन दुर्गम इलाकों तक पहुंचने की चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। जहां विशाल रेगिस्तानी क्षेत्र थे, जहां सड़कें नहीं थीं और संचार सुविधाओं का अभाव था और जोधपुर और जैसलमेर जैसे इलाकों में बड़ी संख्या में ऊंटों का इस्तेमाल किया गया था। जहां भी सार्वजनिक भवन अपर्याप्त थे, वहां मतदान के लिए ‘डाक’ बंगलों और निजी भवनों का भी उपयोग किया गया था। एसवाई कुरैशी ने कहा कि मुख्य रूप से पश्चिमी देशों के आलोचकों समेत कई ऐसे कई लोग थे, जिन्हें लगा था कि पहला चुनाव कराना असफल प्रयोग साबित होगा। उन्होंने कहा कि उस समय भारत में लगभग 84 फीसदी लोग निरक्षर थे। आलोचकों का कहना था कि निरक्षर लोग लोकतंत्र की प्रक्रिया में कैसे हिस्सा ले सकते हैं और उनका मानना था कि हम असफल रहेंगे। निरक्षरता के अलावा, गरीबी, सामाजिक विभाजन और बंटवारे के बाद सांप्रदायिक विभाजन की भी दिक्कत थी। लेकिन हमने पहले ही चुनाव में हमारे असफल रहने की आशंकाओं को गलत साबित कर दिया।

आखिर पीएम मोदी को लेकर क्या चाह रहा है विपक्ष?

आज हम आपको बताएंगे कि पीएम मोदी को लेकर विपक्ष क्या चाह रहा है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजकोट दौरे पर हैं, इस दौरान उन्होंने एक बार फिर ‘मोदी की गारंटी’ का जिक्र किया। उन्होंने दो टूक बोला कि आज देश कह रहा- ‘मोदी की गारंटी यानी, गारंटी पूरा होने की गारंटी। देश को मोदी की गारंटी पर इसलिए अटूट भरोसा है, क्योंकि मैंने राजकोट को गुजरात की पहले एम्स की गारंटी दी थी। तीन साल पहले इसका शिलान्यास किया था और आज लोकार्पण किया, आपके सेवक ने गारंटी पूरी की।’ प्रधानमंत्री ने इससे पहले भी ‘मोदी की गारंटी’ का जिक्र करते हुए एक तरह से जनता के सामने ये बताने की कोशिश की है कि जो उनकी सरकार कहती है उसे पूरा भी करती है। इसीलिए उन्होंने ‘गारंटी’ शब्द का इस्तेमाल किया। कई मौकों पर उन्होंने इस कमेंट के जरिए कांग्रेस समेत विपक्षी दलों पर अटैक भी किया। हालांकि, अब विपक्षी पार्टियों खास तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ‘मोदी की गारंटी’ पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने ‘मोदी की गारंटी’ नारे पर आपत्ति जताई और कहा कि यह भारतीय लोकतंत्र के तानाशाही की ओर बढ़ने का संकेत है। खरगे ही नहीं एनसीपी संस्थापक शरद पवार ने भी इस पर रिएक्ट किया। उन्होंने कहा कि ‘मोदी की गारंटी’ कभी पूरी नहीं हुई।

राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने बीजेपी के नारे ‘मोदी की गारंटी’ पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि यह उन लोगों की गारंटी है जो अपने टैक्स के माध्यम से फंड करते हैं। हम टैक्स देते हैं। ये लोगों की गारंटी है। खरगे ने प्रधानमंत्री के आत्म-केंद्रित दृष्टिकोण की भी आलोचना की। कर्नाटक समाज कल्याण विभाग की ओर से आयोजित एक सम्मेलन में बोलते हुए रविवार को खरगे ने ‘मोदी की गारंटी’ वाले कमेंट पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने जोर देकर कहा कि जिन देशों में लोग अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं, वहां लोकतंत्र बचा है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने बीजेपी पर चुनाव जीतने के लिए हॉर्स ट्रेडिंग का आरोप लगाया। खरगे ने पीएम मोदी के ‘मैं, मैं’ कहने की आदत को भारत के तानाशाही की ओर बढ़ने के संकेत के रूप में संदर्भित किया। खरगे ने तानाशाही को रोकने के लिए अधिकारों की रक्षा के महत्व का जिक्र किया। उन्होंने कर्नाटक, मणिपुर और उत्तराखंड चुनावों में हार्स ट्रेडिंग को लेकर चिंता जताई, और कहा कि इस तरह की कार्रवाई भारतीय संविधान और लोकतंत्र को कमजोर करती हैं। इससे पहले खरगे ने एक कमेंट में कहा था कि ‘मोदी की गारंटी’ केवल झूठ फैलाने की है।

खरगे ही नहीं शरद पवार ने भी ‘मोदी की गारंटी’ पर कमेंट किया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री अक्सर अपनी ‘मोदी की गारंटी’ के बारे में बात करते हैं, लेकिन उनके ‘गारंटी कार्ड’ में कोई खास तारीख ही नहीं हैं। अगर हम बदलाव लाना चाहते हैं, तो हमारी पार्टी के कार्यकर्ताओं का एकजुट होना बहुत जरूरी है। पिछले 60-70 सालों में, हमने कांग्रेस पार्टी के कई नेताओं को देखा है, लेकिन कभी भी संविधान और सामाजिक एकता को लेकर चिंता करने की जरूरत महसूस नहीं हुई। लेकिन, मोदी के सत्ता में आने के बाद से पिछले 10 सालों में, हमने एक अलग प्रधानमंत्री देखा है जो लगातार अपने पूर्व के नेताओं से अलग रुख अपनाते हैं। यही नहीं लोगों में उनके प्रति दुश्मनी पैदा करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

शरद पवार ने कहा कि पीएम मोदी अक्सर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आलोचना करते हैं और उन पर हमला करते हैं। नेहरू, जो एक ऐसे परिवार से थे जिन्होंने काफी संघर्ष किया, यहां तक कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल भी गए। उन्होंने देश को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने संसदीय लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए अथक प्रयास किया, राष्ट्रीय विकास के लिए कई संस्थाओं और संगठनों की स्थापना की। नेहरू के योगदान के बावजूद, मोदी उनकी आलोचना करते रहते हैं। शरद पवार ने किसानों के लिए 70,000 करोड़ रुपये के कर्ज माफ करने के फैसले के लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तारीफ की।

पवार ने कहा कि किसान अभी संकट का सामना कर रहे हैं, जैसे वे मनमोहन सिंह के कार्यकाल में कर रहे थे जब हमें पता चला कि किसान कर्ज के बोझ तले दबे आत्महत्या कर रहे हैं। मनमोहन सिंह ने तुरंत किसानों के लिए 70,000 करोड़ रुपये के कर्ज माफ कर दिए। लेकिन, अब हम किसानों के मुद्दों को फिर से उठते हुए देख रहे हैं। पहले, किसानों ने दिल्ली की सीमा पर लगभग एक साल तक विरोध प्रदर्शन किया था। अब हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की ओर से दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे विरोध प्रदर्शन के साथ इतिहास खुद को दोहराता हुआ प्रतीत हो रहा है। दुर्भाग्य से, सरकार ने उनकी गुहारों को अनसुना कर दिया है, जिससे मुझे विश्वास हो गया है कि सरकार हमारे किसानों का सम्मान नहीं करती है। इस सरकार को सत्ता से हटाना बहुत जरूरी है।

शरद पवार ने कहा कि केंद्र सरकार ने ‘मोदी की गारंटी’ के बैनर तले कई योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन बिना किसी खास तारीख के ये गारंटी खोखली हैं। कई वादे किए गए हैं, लेकिन कोई भी पूरा नहीं हुआ है। राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए, नेहरू, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं ने हमेशा केंद्र और राज्यों के बीच मजबूत संबंध बनाए रखा। उन्होंने लगातार राज्यों का सम्मान किया। लेकिन, मौजूदा सरकार इस मामले में विफल हो रही है। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए, राज्य के मुख्यमंत्रियों के साथ सम्मान का व्यवहार किया जाता था। लेकिन मोदी के नेतृत्व में, राज्य सरकारों के साथ सहयोग की कमी है, जिससे कई अनसुलझे मुद्दे हैं, जिनमें महाराष्ट्र के मुद्दे भी शामिल हैं।

क्या पीएम मोदी बनाना चाहते हैं खाड़ी देशों के साथ संबंध?

पीएम मोदी अब खाड़ी देशों के साथ संबंध बनाने में लगे हुए हैं! खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंध हाल के कुछ सालों में काफी मजबूत हुए हैं। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रोल काफी अहम रहा है। उन्होंने अपने अबतक के कार्यकाल में खाड़ी देशों के बीच संबंधों को नई ऊंचाई देने का प्रयास किया। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी अब तक खाड़ी सहयोग परिषद देशों की 13 यात्राएं कर चुके हैं। इसमें सात यात्राएं तो सिर्फ UAE की हैं। जीसीसी देशों में बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और यूएई हैं। खाड़ी देशों के साथ कमाल की ट्यूनिंग ये मोदी सरकार की कामयाब विदेश नीति और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती साख की एक बानगी भर है। कहा जाए कि अरब देशों के साथ भारत के रिश्ते अबतक के अपने सबसे ऊंचे मुकाम पर हैं तो ये भी गलत नहीं होगा। ऐसा नहीं कि सिर्फ भारत ही खाड़ी देशों के साथ मजबूत रिश्तों के लिए एक्टिव दिख रहा। गल्फ देश भी इन रिश्तों को एक नई ऊंचाई तक ले जाने को लालायित नजर आ रहे। आखिर खाड़ी देश पीएम मोदी की टॉप प्राथमिकता में क्यों हैं, जानिए। पीएम मोदी ने हाल ही में खाड़ी देशों की अपनी यात्रा पूरी की। प्रधानमंत्री के हालिया दौरों ने इस क्षेत्र के साथ संबंधों को और मजबूत किया है। खाड़ी देशों में लगभग 9 मिलियन यानी 90 लाख भारतीय प्रवासी रहते हैं। इनमें सबसे ज्यादा 34.3 लाख भारतीय यूएई में, उसके बाद 25.9 लाख सऊदी अरब में, 10.3 लाख कुवैत, 7.8 लाख ओमान, 7.5 लाख कतर और 3.3 लाख भारतीय बहरीन में रहते हैं। खाड़ी देशों में भारतीय प्रवासियों की विशाल तादाद का पीएम मोदी को राजनीतिक फायदा भी मिलता है। विदेश में रहने वाले भारतीय हर साल भारत में जितना पैसा रेमिटेंस के तौर पर भेजते हैं, उनका तकरीबन आधा तो सिर्फ जीसीसी के देशों से आता है।

विदेश में रहने वाले भारतीय हर साल इंडिया में जितना पैसा रेमिटेंस के तौर पर भेजते हैं, उनका तकरीबन आधा तो सिर्फ खाड़ी सहयोग परिषद जीसीसी के देशों से आता है। इन देशों में 2021-22 में प्राप्त 90 बिलियन डॉलर के रेमिटेंस का लगभग 30% हिस्सा है, जिसमें अकेले यूएई का योगदान 18 फीसदी है। 2014-15 में भारत को विदेश में रहने वाले अपने नागरिकों से मिले कुल रेमिटेंस का करीब 29 फीसदी खाड़ी सहयोग परिषद देशों से आता है। 2020-21 में बढ़कर 50.3 फीसदी हो गया। 2020-21 में भारत को कुल 89,12.7 करोड़ डॉलर का रेमिटेंस मिला था जिसमें साढ़े 4 हजार करोड़ डॉलर सिर्फ जीसीसी देशों से मिला था।

खाड़ी देश भारत की तेल और गैस जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण हैं। भारत अपनी तेल आवश्यकताओं का लगभग 60% खाड़ी देशों से पूरा करता है। एलएनजी और दोनों के लिए कतर ही भारत का सबसे बड़ा स्त्रोत है। खाड़ी देशों के साथ भारत का व्यापार भी बढ़ा है। यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। भारत ने खुद को एक विश्वसनीय भागीदार के रूप में स्थापित किया है जो GCC के भीतर संघर्षों या प्रतिद्वंद्विता में हस्तक्षेप नहीं करता है। अरब देशों के साथ भारत के मजबूत संबंध उसके बड़े मुस्लिम समुदाय के कारण फायदेमंद हैं और इस्लामिक सहयोग संगठन में पाकिस्तान के भारत विरोधी एजेंडे का मुकाबला करने में मदद करते हैं। पीएम मोदी पहली बार 2015 में यूएई दौरे पर आए थे जो तब 34 सालों में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला यूएई दौरा था। इजरायल का दौरा करने वाले भी वह पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं। मोदी के कार्यकाल के दौरान इजरायल के साथ भारत के रिश्ते और मजबूत हुए ही हैं, अरब देशों के साथ ताल्लुकात भी एक नई ऊंचाई पर हैं। इजरायल और अरब देशों के बीच छत्तीस के आंकड़े के मद्देनजर दोनों के साथ भारत की दोस्ती कामयाब विदेश नीति की एक नई ही इबारत लिख रही है।

पाकिस्तान के कश्मीर मुद्दे पर लगातार ध्यान देने के बावजूद, सऊदी अरब और यूएई जैसे देश आतंकवाद पर भारत की चिंताओं के प्रति अधिक उत्तरदायी हो गए हैं। इसी बेहतर विश्वास ने सुरक्षा, खुफिया और रक्षा उद्योगों पर करीबी सहयोग का नेतृत्व किया है। कतर की ओर से आठ पूर्व-भारतीय नौसेना अधिकारियों की रिहाई को इस सहयोग के परिणाम के तौर पर ही देखा जा रहा है। भारत अब आतंकवाद विरोधी, रक्षा और संयुक्त सैन्य अभ्यासों पर खाड़ी देशों के साथ नजदीकी सहयोग करता है। इसके अतिरिक्त, ओमान ने भारत को रणनीतिक ड्यूकम बंदरगाह तक पहुंच प्रदान की है। उधर सऊदी क्राउन प्रिंस एमबीएस ने 2019 में भारत की अपनी यात्रा के दौरान 100 बिलियन डॉलर के निवेश का वादा किया था।

पिछले साल शुरू किया गया अंतरमहाद्वीपीय गलियारा आईएमईईसी में भारत और खाड़ी देशों के बीच विकास को प्रोत्साहित करने और संपर्क बढ़ाने की क्षमता है। यह चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव बीआरआई का एक विकल्प प्रदान करता है। आईएमईईसी का पूर्वी गलियारा भारत को अरब की खाड़ी से जोड़ेगा, जिससे भारत की इस क्षेत्र में रणनीतिक उपस्थिति मजबूत होगी और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित होगी। ओमान सुल्तान की यात्रा और पीएम मोदी के हालिया दौरे समेत भारत के साथ खाड़ी देशों की निरंतर व्यस्तता ये जाहिर करती है कि अरब राष्ट्रों ने भारत की विकसित स्थिति पर विशेष तौर ध्यान दिया है।

रणवीर सिंह दीपिका पादुकोण के साथ बेबी के लिए नाम शॉर्टलिस्ट कर रहे हैं.

0

सितंबर में घर आएगा नया सदस्य, दीपिका-रणबीर ने पहले ही तय कर लिया बच्चे का नाम? बॉलीवुड का ये ‘पावर कपल’ इस साल सितंबर में दो से तीन साल का हो जाएगा। दीपिका. बच्चा अभी भी कई महीने दूर है। लेकिन तुम मेरी मां को बर्दाश्त नहीं करोगे. क्या आपने होने वाले बच्चे का नाम तय कर लिया है? दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह माता-पिता बनने वाले हैं। कुछ दिन पहले ऐसी खबर सामने आई थी. गुरुवार की सुबह भावी माता-पिता ने उस अटकल पर मुहर लगा दी. दीपवीर के घर एक नया मेहमान आने वाला है. बॉलीवुड का ये ‘पावर कपल’ इस साल सितंबर में दो से तीन साल का हो जाएगा. दीपिका के इंस्टाग्राम पोस्ट पर लिखा है, ‘सितंबर 2024’। ऐसे में अटकलें लगना स्वाभाविक है, इस पोस्ट में दीपिका ने बच्चे के जन्म के समय का भी जिक्र किया है. दीपिका ने इंस्टाग्राम पोस्ट में बच्चे के कपड़े, जूते, टोपी की ‘इमोजी’ भी दी। बच्चा अभी भी कई महीने दूर है। लेकिन तुम मेरी मां को बर्दाश्त नहीं करोगे. क्या आपने होने वाले बच्चे का नाम तय कर लिया है?

रणवीर और दीपिका दोनों को बच्चे बहुत पसंद हैं। एक इंटरव्यू में दोनों ने कहा था कि वे बच्चों के बारे में सोच रहे हैं. उस वक्त दीपिका ने कहा था, ”रणवीर और मुझे बच्चे बहुत पसंद हैं. परिवार में नए मेहमान का इंतजार कर रहा हूं।” दीपिका यह साफ करना चाहती थीं कि वह जल्द ही खुशखबरी देने वाली हैं। इतना ही नहीं रणबीर ने बच्चे का नाम भी तय कर लिया है.

रणवीर को दीपिका जैसी प्यारी और प्यारी लड़की चाहिए। रणवीर ने बताई अपने मन की बात. अगर बच्चा लड़का या लड़की है तो उसका नाम शौर्यवीर सिंह रखें। बेटी हो या बेटा, रणवीर-दीपिका कौन रोशन करेगा घर, खुशखबरी पाने के लिए सितंबर तक इंतजार करना होगा। वह गर्भवती है। एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर ये बात कही. काफी समय से बॉलीवुड में ऐसी अफवाहें थीं कि वह प्रेग्नेंट हैं। हालांकि दीपिका ने उन प्रैक्टिस में ज्यादा प्रैक्टिस नहीं की. उन्होंने खुद इस बारे में अपना मुंह नहीं खोला.

लेकिन इस बार दीपिका ने इंस्टाग्राम पर अपनी प्रेग्नेंसी की खबर अनाउंस की. इंस्टाग्राम पोस्ट में लिखा है, ‘सितंबर 2024’। ऐसे में अटकलें लगना स्वाभाविक है, इस पोस्ट के जरिए दीपिका ने बच्चे के जन्म के समय का भी जिक्र किया है. दीपिका ने इंस्टाग्राम पोस्ट में बच्चे के कपड़े, जूते, टोपी की ‘इमोजी’ भी दी। ‘बाफ्टा अवॉर्ड्स’ के दौरान कई लोगों की नजर दीपिका के ‘बेबी बंप’ पर पड़ी। इसके बाद से अफवाहों का दौर जारी है. लेकिन इसके बाद भी न तो एक्ट्रेस और न ही रणवीर सिंह ने सार्वजनिक तौर पर इस मामले पर कोई टिप्पणी की. लेकिन इस बार दीपिका ने यह घोषणा करने के लिए सोशल मीडिया को चुना है कि वह मां बनने वाली हैं। परिवार में एक नया सदस्य आने वाला है. वहीं दीपिका और रणवीर के परिवार में खुशियों का माहौल है। जैसे ही एक्ट्रेस की प्रेग्नेंसी की खबर सामने आई, बॉलीवुड सितारों से लेकर सोशल मीडिया पर उनके फॉलोअर्स तक सभी ने अपनी-अपनी इच्छाएं जाहिर कीं.

प्रियंका चोपड़ा ने इस खबर पर उत्साह जताते हुए लिखा, ‘मुबारक’. एक अन्य अभिनेता विक्रांत मैसी ने जवाब में लिखा, “ओएमजी! दोनों को शुभकामनाएँ।” सोनाक्षी सिन्हा, कृति सेनन, वरुण धवन, अनिल कपूर, माधुरी दीक्षित, सोनम कपूर, अभिषेक बच्चन और कई अन्य लोगों ने बधाई दी।

वह और रणवीर अपने परिवार में एक नए सदस्य का स्वागत करना चाहते हैं। बॉलीवुड एक्ट्रेस ने एक इंटरव्यू में अपनी ये इच्छा जाहिर की. उस वक्त उन्होंने कहा था, ”रणवीर और मैं बच्चों से बहुत प्यार करते हैं। परिवार में नए मेहमान का इंतजार कर रहा हूं।” दीपिका यह साफ करना चाहती थीं कि वह जल्द ही खुशखबरी देने वाली हैं। आख़िरकार दोनों के परिवार को खुशखबरी मिली। दो परिवार अब नए सदस्य का इंतजार कर रहे हैं.

रणवीर और दीपिका बॉलीवुड के सबसे क्यूट कपल्स में से एक हैं। इनका प्रेम प्रसंग 2012 से शुरू हुआ। रणवीर और दीपिका ने 2018 में शादी की थी। उन्होंने इटली के लेक कोमो में ‘डेस्टिनेशन वेडिंग’ की। बॉलीवुड का ये ‘पावर कपल’ इस साल सितंबर में दो से तीन साल का हो जाएगा. दीपिका के इंस्टाग्राम पोस्ट पर लिखा है, ‘सितंबर 2024’। ऐसे में अटकलें लगना स्वाभाविक है, इस पोस्ट में दीपिका ने बच्चे के जन्म के समय का भी जिक्र किया है. दीपिका ने इंस्टाग्राम पोस्ट में बच्चे के कपड़े, जूते, टोपी की ‘इमोजी’ भी दी। बच्चा अभी भी कई महीने दूर है। लेकिन तुम मेरी मां को बर्दाश्त नहीं करोगे. क्या आपने होने वाले बच्चे का नाम तय कर लिया है?

बीसीसीआई को केएल राहुल की चोट की घटना के संबंध में अधिक स्पष्टता प्रदान करनी चाहिए.

0

धुंए का नाम है राहुल! ’90 प्रतिशत स्वस्थ’ बल्लेबाज नहीं खेल सका, इतना छिपाव क्यों? लोकेश राहुल भारत-इंग्लैंड सीरीज के आखिरी चार टेस्ट नहीं खेल सके. उनसे हर टेस्ट से पहले खेलने की उम्मीद की जाती थी लेकिन आखिरी समय में उन्हें बाहर कर दिया गया। इतना धुआं क्यों? आख़िर भारतीय क्रिकेट बोर्ड के अंदर क्या चल रहा है? लोकेश राहुल के बारे में इतनी गोपनीयता क्यों? क्या वह स्वस्थ है? अगर हां तो फिर इंग्लैंड के खिलाफ आखिरी चार टेस्ट क्यों नहीं खेल सके? और अगर वह चोटिल हो गए तो उन्हें हर टेस्ट से पहले खेलने का मौका क्यों दिया गया? चयनकर्ताओं ने उन्हें टीम में क्यों रखा? भारतीय क्रिकेट में वास्तव में क्या हुआ? सवाल उठता है.

हैदराबाद में पहले टेस्ट के बाद राहुल की मांसपेशियों में खिंचाव आ गया था. उन्हें विशाखापत्तनम में दूसरे टेस्ट से बाहर कर दिया गया था. राहुल को बेंगलुरु स्थित नेशनल क्रिकेट अकादमी में भेज दिया गया. उस वक्त बोर्ड ने एक बयान में कहा था कि राहुल की मैच फिटनेस 90 फीसदी है. उनकी मांसपेशियों में थोड़ा तनाव है. इसलिए उन्हें अकादमी भेजा गया. वह 100 फीसदी ठीक होने के बाद टीम से जुड़ेंगे. उस बयान को 18 दिन बीत चुके हैं. राहुल 10 फीसदी भी रिकवर नहीं कर सके.

राजकोट में तीसरे टेस्ट से पहले राहुल ने अपना एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया. इसमें देखा जा सकता है कि वह बल्लेबाजी कर रहे हैं. ऐसा नहीं लगा कि कोई समस्या थी. राहुल के वीडियो से भारतीय प्रशंसकों को उम्मीद जगी है कि वह तीसरे टेस्ट के लिए उपलब्ध रहेंगे. शुरुआती टीम में राहुल भी थे. लेकिन राजकोट टेस्ट शुरू होने से पहले बोर्ड ने अचानक ऐलान कर दिया कि राहुल नहीं खेल पाएंगे. उनकी चोट अभी भी ठीक नहीं हुई है. राहुल ने जो वीडियो सोशल मीडिया पर दिया उसे बोर्ड ने अच्छे से नहीं लिया. उन्होंने कहा कि राहुल ने वीडियो से दर्शकों को गुमराह किया है.

राजकोट में तीसरे टेस्ट के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में रोहित शर्मा ने एक बार फिर राहुल के प्रदर्शन को लेकर सकारात्मक बात कही. भारतीय कप्तान ने कहा कि राहुल रांची में चौथे टेस्ट से पहले ठीक हो जाएंगे. वह महेंद्र सिंह धोनी के होम ग्राउंड पर मिलेंगे. रोहित की बात के दो दिन बाद बोर्ड ने फिर जानकारी दी कि राहुल को रांची टेस्ट से बाहर किया जा रहा है. पांचवें टेस्ट में भी यही तस्वीर देखने को मिली. 7 मार्च से टेस्ट धर्मशाला में शुरू और ख़त्म होगा. इससे पहले बोर्ड ने गुरुवार को जानकारी दी कि राहुल उस टेस्ट में भी नहीं खेल पाएंगे. इतना ही नहीं, लंदन में विशेषज्ञों से राहुल की चोट पर चर्चा की जा रही है. जरूरत पड़ने पर उनकी मदद ली जाएगी। 17-18 दिन पहले मांसपेशियों में मामूली तनाव अचानक इतना कैसे बढ़ गया कि विदेशी डॉक्टरों की मदद लेनी पड़ी? इतने समय से ऐसा सुनने को नहीं मिला है.

टीम के बल्लेबाजी कोच विक्रम राठौड़ की बातों से साफ है कि भारतीय टीम भी राहुल की चोट को लेकर असमंजस में है. रांची टेस्ट से पहले राठौड़ ने कहा, ”मेरे लिए एक क्रिकेटर या तो स्वस्थ है या बीमार है. बीच में कुछ नहीं होता. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितना प्रतिशत स्वस्थ है। मेडिकल टीम को राहुल की चोट के बारे में सब कुछ पता है. हमें उसके बारे में कुछ नहीं पता. हम केवल उन लोगों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जो टीम में हैं।”

यदि हां, तो किसके पास विशेष जानकारी है कि राहुल की चोट वास्तव में कितनी गंभीर है? अगर वे चयनकर्ताओं के साथ थे तो अजीत अगरकर की कमेटी ने उन्हें बार-बार शुरुआती टीम में क्यों रखा? यदि हां, तो बोर्ड, राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी, प्रबंधन और चयनकर्ताओं के बीच पर्याप्त संचार नहीं है। इसलिए दिखाई देता है ये कोहरा? इसका जवाब अभी भी नहीं मिल पाया है. लोकेश राहुल धर्मशाला में आखिरी टेस्ट नहीं खेल पाएंगे. इस घोषणा के बाद लखनऊ सुपर जायंट्स ने उपकप्तान के नाम की घोषणा की. उनके कप्तान राहुल हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि उनकी चोट ठीक होने में कितना समय लगेगा. इसीलिए लखनऊ ने उपकप्तान बनाया। राहुल के नहीं खेलने पर निकोलस पूरन टीम की कप्तानी करेंगे.

पिछले आईपीएल में राहुल के चोट के कारण टीम से बाहर होने के बाद क्रुणाल पंड्या ने टीम का नेतृत्व किया था. इस बार उन्हें जिम्मेदारी नहीं दी गई. वेस्टइंडीज का नेतृत्व करने वाले पूरन को इस बार के आईपीएल में जिम्मेदारी दी गई थी। हालांकि अगर राहुल खेलते हैं तो वह कप्तान हैं. पिछले आईपीएल से पहले लखनऊ ने पूरन को 16 करोड़ में खरीदा था. वह टीम के विकेटकीपरों में से एक हैं. उन्होंने 15 मैचों में 358 रन बनाए. औसत 29.83, स्ट्राइक रेट 172.95.

कृष्णानगर में बीजेपी रैली के मकसद पर सवाल उठा रही है.

0

एक छोटे से मैदान में कैसे इकट्ठा हों! कृष्णानगर में मोदी की सभा में भीड़ के मकसद पर सवाल बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी इस बार कृष्णानगर लोकसभा पर विहंगम दृष्टि डालना चाहती है. कृष्णानगर सभा स्थल को उखाड़ फेंकने और पूरे शहर को भाजपा कार्यकर्ताओं से भरने की योजना बनाई गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्य में आ रहे हैं. 1 मार्च को हुगली के आरामबाग के बाद 2 मार्च को प्रधानमंत्री नादिया के कृष्णानगर गवर्नमेंट कॉलेज मैदान में सभा करेंगे. उस मैदान में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की प्रशासनिक बैठक के अलावा कई अहम बैठकें हुईं. सुरक्षा और अन्य सहायक उपायों सहित मैदान की अधिकतम बैठने की क्षमता लगभग 80,000 है। हालांकि, बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, मोदी की सभा के दिन केंद्रीय नेतृत्व ने नदिया और मुर्शिदाबाद में पांच लोकसभा नेताओं की कम से कम 180,000 की भीड़ जुटाने का लक्ष्य रखा है. लेकिन दोनों जिलों के निचले स्तर के नेता उस लक्ष्य को लेकर संशय में हैं! कुछ लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या बीजेपी के केंद्रीय नेताओं और पर्यवेक्षकों की योजना पर अमल हुआ तो अस्सी हजार कार्यकर्ता-समर्थकों को कार्यक्रम स्थल पर जगह मिल सकेगी. लेकिन बाकी एक लाख कहाँ होंगे?

प्रधानमंत्री का आरामबाग और कृष्णानगर में कुछ सरकारी परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन करने का कार्यक्रम है। नतीजा यह हुआ कि दोनों जगह दो-दो स्टेज बनाने पड़े। एक प्रशासनिक और दूसरा राजनीतिक मंच.

कृष्णानगर संगठनात्मक जिले में भाजपा के एक मंडल अध्यक्ष के शब्दों में, जो नाम नहीं बताना चाहते थे, “केवल चार दिन का लक्ष्य दिया गया है। मैंने अभी भी बूथ नेतृत्व के साथ बैठक पूरी नहीं की है. इस तरह से निर्णय थोप दोगे तो सब कुछ नहीं हो पाएगा! मेरे मंडल से लोगों को ले जाने के लिए आठ बसें मांगी गई हैं। अगर एक-एक बूथ को बूथों में बांट दिया जाए तो भी जो खड़ी है उससे चार बसें भर जाएंगी। बाकी चार बसों का क्या होगा यह अभी भी समझ नहीं आ रहा है। कृष्णानगर सभा स्थल को उखाड़ फेंकने और पूरे शहर को भाजपा कार्यकर्ताओं से भरने की योजना बनाई गई है। रेलवे स्टेशन से लेकर बस स्टैंड तक, नौका से लेकर सड़क तक – भाजपा नेता कृष्णानगर शहर और उपनगरों के आसपास के प्रमुख इलाकों में भीड़ बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। नादिया के दो लोकसभा क्षेत्र कृष्णानगर और राणाघाट के अलावा पड़ोसी जिलों के तीन लोकसभा क्षेत्र मुर्शिदाबाद, बहरामपुर और जंगीपुर को केंद्रीय पर्यवेक्षकों और केंद्रीय नेताओं की उपस्थिति में संगठनात्मक सभाओं के लिए अलग-अलग लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। सूत्रों के मुताबिक, कृष्णानगर संगठनात्मक जिले के लिए 45,000, राणाघाट संगठनात्मक जिले के लिए 55,000, मुर्शिदाबाद के लिए 20,000, जंगीपुर के लिए 10,000, बहरामपुर लोकसभा क्षेत्र के लिए 30,000 और इसके अलावा कई सहयोगी संगठनों के लिए 30,000 लोगों का लक्ष्य रखा गया है. .

बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, मोदी की सभा में लोगों को लाने के लिए अलग-अलग संगठनात्मक जिलों के लिए अलग-अलग परिवहन व्यवस्था की गई है. जंगीपुर और मुर्शिदाबाद से समर्थकों को कार्यक्रम स्थल तक लाने के लिए यात्री बसों और छोटी कारों पर जोर दिया गया है. राणाघाट और बहरामपुर संगठनात्मक जिलों के मामले में कार्यकर्ताओं-समर्थकों को ट्रेन से लाने की योजना है. कृष्णानगर संगठनात्मक जिले के लिए प्रत्येक मंडल के लिए चार से पांच बसों की व्यवस्था की गई है। सूत्रों की रिपोर्ट है कि नदिया और मुर्शिदाबाद के जमीनी स्तर के नेता और कार्यकर्ता इस बात से चिंतित हैं कि इतनी तैयारियों के बावजूद सभा का लक्ष्य कैसे हासिल किया जाएगा. भाजपा के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, कई संगठनात्मक जिला नेताओं ने शुरू में सभा के उद्देश्यों को पूरा करने में कठिनाइयों की सूचना दी। उस मामले में, केंद्रीय नेताओं ने तर्क दिया कि पांच लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा का पांच लाख समर्थकों का लक्ष्य करीब है। इसलिए 1 लाख 80 हजार का लक्ष्य हर हाल में पूरा होना चाहिए.प्रधानमंत्री की सभा में भीड़ का लक्ष्य पूरा होगा या नहीं, इस पर भाजपा के जिला अध्यक्षों ने संदेह जताया है, लेकिन जिला अध्यक्ष इसे पूरा करने को लेकर आश्वस्त हैं. लक्ष्य। कृष्णानगर संगठनात्मक जिला अध्यक्ष अर्जुन विश्वास ने कहा, ‘हमें 45,000 का लक्ष्य दिया गया है। 60,000 लोगों के जुटने की उम्मीद है. न सिर्फ कार्यकर्ता-समर्थक बल्कि आम लोग भी अपनी पहल पर प्रधानमंत्री के सभा स्थल पर आएंगे. तो कुल सभाओं की संख्या 2 लाख को पार कर जाएगी.

मुर्शिदाबाद संगठनात्मक जिला अध्यक्ष शखारोव सरकार ने कहा, “मोदीजी की बैठक को लेकर जो उन्माद पैदा हुआ है, उससे बैठक के लक्ष्य पर कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे आश्चर्य है कि क्या मैं ट्रैफिक में नादिया में प्रवेश कर सकता हूं या नहीं!”

बीजेपी के नेतृत्व वाला एनडीए बहुमत के आंकड़े 121 से सिर्फ 4 कदम पीछे है.

0

अंतर सिर्फ 4 सीटों का है. संसद के ऊपरी सदन में बीजेपी के नेतृत्व वाला एनडीए बहुमत की दहलीज पर है. अगर नरेंद्र मोदी-अमित शाह को वे चार सीटें मिल गईं तो उन्हें किसी भी विवादास्पद विधेयक को पारित करने के लिए बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस जैसी पार्टियों का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

सत्तारूढ़ गठबंधन के पास राज्यसभा में पर्याप्त सीटें नहीं थीं, भले ही नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के दो कार्यकालों के दौरान एनडीए के पास लोकसभा में भारी बहुमत था। संसद के ऊपरी सदन में इस बार वांछित संख्या कम होने की संभावना है। इस हफ्ते हुए राज्यसभा चुनाव में बीजेपी ने 56 में से 30 सीटें जीतीं। तीन राज्यों में कल हुए 15 निर्वाचन क्षेत्रों में से 10 पर पद्म उम्मीदवारों ने जीत हासिल की। इसमें उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में ‘क्रॉस वोटिंग’ के चलते बीजेपी दो अतिरिक्त सीटों पर कब्जा करने में कामयाब रही.

बीजेपी फिलहाल राज्यसभा में सबसे बड़ी पार्टी है. नए सदस्यों के शपथ लेने के बाद बीजेपी की सांसद संख्या 97 हो जाएगी. वहीं एनडीए के सांसदों की संख्या बढ़कर 117 हो जाएगी. अब राज्यसभा में 240 सदस्य हैं. ऐसे में बहुमत के लिए 121 वोटों की जरूरत है. यानी मोदी-शाहेरा बहुमत से चार सीट दूर हैं. राज्यसभा सचिवालय ने कहा कि हालांकि राज्यसभा की सदस्य संख्या 245 है, लेकिन राष्ट्रपति शासन के कारण जम्मू-कश्मीर में चार सीटें पिछले कुछ वर्षों से खाली हैं। इसके अलावा राष्ट्रपति पद के एक उम्मीदवार का पद भी खाली है. इस लिस्ट में कांग्रेस दूसरे नंबर पर है. इनकी सदस्यता 29 है.

पिछले दिसंबर में राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में सत्ता पर कब्ज़ा करने के बाद, नीतीश कुमार बिहार में सत्ता में लौटे, भाजपा नेतृत्व को उम्मीद है कि एनडीए अगले साल राज्यसभा चुनाव में बहुमत हासिल करने में सक्षम होगा। एक बीजेपी का
नेता के शब्दों में, ”भले ही पार्टी के पास लोकसभा में बहुमत था, लेकिन राज्यसभा में नहीं था.” परिणामस्वरूप, उसे कुछ मामलों में, विशेषकर विवादास्पद विधेयकों को पारित करने में, अन्य दलों के समर्थन पर निर्भर रहना पड़ा। उम्मीद है कि इस साल के बाद उनकी जरूरत नहीं पड़ेगी.” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्य में आ रहे हैं. 1 मार्च को हुगली के आरामबाग के बाद 2 मार्च को प्रधानमंत्री नादिया के कृष्णानगर गवर्नमेंट कॉलेज मैदान में सभा करेंगे. उस मैदान में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की प्रशासनिक बैठक के अलावा कई अहम बैठकें हुईं. सुरक्षा और अन्य सहायक उपायों सहित मैदान की अधिकतम बैठने की क्षमता लगभग 80,000 है। हालांकि, बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, मोदी की सभा के दिन केंद्रीय नेतृत्व ने नदिया और मुर्शिदाबाद में पांच लोकसभा नेताओं की कम से कम 180,000 की भीड़ जुटाने का लक्ष्य रखा है. लेकिन दोनों जिलों के निचले स्तर के नेता उस लक्ष्य को लेकर संशय में हैं! कुछ लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या बीजेपी के केंद्रीय नेताओं और पर्यवेक्षकों की योजना पर अमल हुआ तो अस्सी हजार कार्यकर्ता-समर्थकों को कार्यक्रम स्थल पर जगह मिल सकेगी. लेकिन बाकी एक लाख कहाँ होंगे?

प्रधानमंत्री का आरामबाग और कृष्णानगर में कुछ सरकारी परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन करने का कार्यक्रम है। नतीजा यह हुआ कि दोनों जगह दो-दो स्टेज बनाने पड़े। एक प्रशासनिक और दूसरा राजनीतिक मंच.

कृष्णानगर संगठनात्मक जिले में भाजपा के एक मंडल अध्यक्ष के शब्दों में, जो नाम नहीं बताना चाहते थे, “केवल चार दिन का लक्ष्य दिया गया है। मैंने अभी भी बूथ नेतृत्व के साथ बैठक पूरी नहीं की है. इस तरह से निर्णय थोप दोगे तो सब कुछ नहीं हो पाएगा! मेरे मंडल से लोगों को ले जाने के लिए आठ बसें मांगी गई हैं। अगर एक-एक बूथ को बूथों में बांट दिया जाए तो भी जो खड़ी है उससे चार बसें भर जाएंगी। बाकी चार बसों का क्या होगा यह अभी भी समझ नहीं आ रहा है। कृष्णानगर सभा स्थल को उखाड़ फेंकने और पूरे शहर को भाजपा कार्यकर्ताओं से भरने की योजना बनाई गई है। रेलवे स्टेशन से लेकर बस स्टैंड तक, नौका से लेकर सड़क तक – भाजपा नेता कृष्णानगर शहर और उपनगरों के आसपास के प्रमुख इलाकों में भीड़ बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। नादिया के दो लोकसभा क्षेत्रों कृष्णानगर और राणाघाट के अलावा, पड़ोसी जिलों के तीन लोकसभा क्षेत्रों मुर्शिदाबाद, बहरामपुर और जंगीपुर को केंद्रीय पर्यवेक्षकों और केंद्रीय नेताओं की उपस्थिति में संगठनात्मक सभाओं के लिए अलग-अलग लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। सूत्रों के मुताबिक, कृष्णानगर संगठनात्मक जिले के लिए 45,000, राणाघाट संगठनात्मक जिले के लिए 55,000, मुर्शिदाबाद के लिए 20,000, जंगीपुर के लिए 10,000, बहरामपुर लोकसभा क्षेत्र के लिए 30,000 और इसके अलावा कई सहयोगी संगठनों के लिए 30,000 लोगों का लक्ष्य रखा गया है. .

भारतीय अर्थव्यवस्था अक्टूबर-दिसंबर 2023 में 8.4% की दर से बढ़ी, जबकि एक साल पहले यह 4.3% थी.

तीसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 8.4 प्रतिशत, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने ‘पूर्वानुमान’ में संशोधन किया दो साल पहले, विश्व बैंक, आईएमएफ सहित विभिन्न वित्तीय और सलाहकार निकायों ने कहा था कि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक अपवाद है जो महामारी और यूक्रेन द्वारा अस्थिर हो गया है। युद्ध। । भारत की वित्तीय विकास दर में लगातार सुधार हो रहा है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा गुरुवार को जारी आंकड़ों से पता चला है कि वित्त वर्ष 2023-24 की तीसरी तिमाही यानी अक्टूबर-दिसंबर में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 8.4 फीसदी रही। वित्त वर्ष 2022-23 की तीसरी तिमाही में यह दर सिर्फ 8.4 फीसदी थी.

चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही यानी जुलाई-सितंबर में यह विकास दर 8 फीसदी से भी कम रही. इस बार कुछ सुधार हुआ है. कुछ आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक अगर यही रुख जारी रहा तो चालू वित्त वर्ष में वित्तीय विकास दर 7.6 फीसदी से अधिक हो जाएगी. वास्तविक विकास दर अक्टूबर-दिसंबर में संभावित आर्थिक विकास के आर्थिक विशेषज्ञों के पूर्वानुमान से अधिक हो गई। रॉयटर्स के अर्थशास्त्रियों ने वित्त वर्ष 2023-24 की तीसरी तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 6.6 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था, लेकिन वास्तविक ग्रोथ इससे कहीं ज्यादा थी. दरअसल, इस साल जनवरी में एनएसओ ने अपने शुरुआती अनुमान में कहा था कि वित्त वर्ष 2023-24 के लिए जीडीपी ग्रोथ रेट 7.3 फीसदी रह सकती है. लेकिन गुरुवार को उस अनुमान को संशोधित कर 7.6 फीसदी कर दिया गया.

संयोग से, दो साल पहले, विश्व बैंक, आईएमएफ, ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स सहित विभिन्न वित्तीय और परामर्श संगठनों ने कहा था कि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में असाधारण है, जो यूक्रेन में महामारी और युद्ध के कारण अनिश्चित हो गया है। ऐसे में यह जिज्ञासा पैदा हो गई है कि क्या वित्त वर्ष 2022-23 में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 7 फीसदी को छू सकती है. लेकिन पिछले साल मई में जारी सरकारी रिपोर्ट में कहा गया था कि जीडीपी विकास दर 7.2 फीसदी थी. इस बार इसमें इजाफा होने जा रहा है. सलाहकार नाइट फ्रैंक ने कहा कि भारत में अति-अमीर लोगों की संख्या (कुल संपत्ति 30 मिलियन डॉलर या लगभग 249 करोड़ रुपये से अधिक) 2022 की तुलना में पिछले साल 6% बढ़कर 13,263 हो गई।

अध्ययन का दावा है, पांच वर्षों (2023 से 2028) में यह संख्या लगभग 50% बढ़कर 19,908 हो सकती है। जनसंख्या वृद्धि दर विश्व में सर्वाधिक है। वे अरबपति अपनी निवेश योग्य संपत्ति का 17% विलासिता की वस्तुओं पर खर्च कर रहे हैं। शीर्ष पर घड़ी. उसके बाद तस्वीरें और आभूषण. यहां कारें, सिक्के, शराब, दुर्लभ व्हिस्की, फर्नीचर, हैंडबैग भी हैं। आवास पर 32 फीसदी खर्च. 12% इस साल नया घर खरीदने पर विचार कर रहे हैं। नाइट फ्रैंक के सीएमडी शिशिर बैजल ने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि 90 फीसदी अरबपतियों को उम्मीद है कि भारत की वित्तीय समृद्धि के कारण इस साल उनकी संपत्ति में बढ़ोतरी होगी. लोकसभा चुनाव सामने हैं. इस समय केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पश्चिम बंगाल आईं और राज्य सरकार पर हमला बोला. चंचछोला ने कहा कि इस राज्य की अर्थव्यवस्था लगभग चरमरा गयी है. बुनियादी ढांचे में कोई सुधार नहीं. इसके अलावा, बंगाल की तृणमूल सरकार वित्तीय नैतिकता उधार नहीं ले रही है। 100 दिन काम योजना और आवास योजना में भ्रष्टाचार हो रहा है. इसके अलावा, राज्य राजकोषीय स्वास्थ्य के लगभग हर पैमाने पर विफल रहा है। निर्मला ने कहा, पश्चिम बंगाल अपार संभावनाओं वाला राज्य है. मोदी सरकार चाहती है कि पूर्वी क्षेत्र देश की आर्थिक विकास यात्रा में पर्यटन का इंजन बने।

हालांकि, राज्य सरकार निर्मला के बयान को महत्व देने से कतरा रही है. केंद्रीय वित्त मंत्री के आरोपों के बारे में पूछे जाने पर राज्य के वित्त विभाग की स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने कहा कि वे इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं.

इस दिन निर्मला ने ममता बनर्जी सरकार की आलोचना की और कहा कि राज्य पिछले 12 सालों में बेहद कर्जदार हो गया है. राजकोष की आय का 35 प्रतिशत भाग लिये गये ऋण पर ब्याज चुकाने तथा सरकारी कर्मचारियों की पेंशन देने में चला जाता है। परिणामस्वरूप, पूंजी वृद्धि दर में गिरावट जारी है। 2010 के 6.7% से घटकर यह 2.9% पर आ गया है.

यह टिप्पणी करते हुए कि पश्चिम बंगाल कभी उद्योग के मामले में देश के अग्रणी राज्यों में से एक था, केंद्रीय वित्त मंत्री ने आरोप लगाया कि देश के कुल औद्योगिक उत्पादन में राज्य का योगदान अब घट रहा है। उन्होंने कहा कि 1947 में पूरे देश का 24 फीसदी औद्योगिक उत्पादन बंगाल से होता था. लेकिन 2020-21 में यह घटकर 3.5 फीसदी रह गई है. परिणामस्वरूप, पिछले दो दशकों से राज्य की प्रति व्यक्ति आय दर में गिरावट आ रही है।