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क्या समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन बीजेपी के लिए बन सकता है मुसीबत?

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन बीजेपी के लिए मुसीबत बन सकता है! समाजवादी पार्टी से हुए गठबंधन के अनुसार समाजवादी पार्टी ने यूपी में 17 लोकसभा सीटें कांग्रेस को दी हैं, वहीं कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में एक सीट खजुराहो सपा को दी है। यही नहीं उत्तराखंड की पांच सीटों पर समाजवादी पार्टी कांग्रेस को समर्थन देगी। यूपी में जो सीटें कांग्रेस को मिली हैं, उनकी बात करें तो अमेठी, रायबरेली के साथ कानपुर फतेहपुर सीकरी, बासगांव, सहारनपुर, प्रयागराज, महराजगंज, वाराणसी, अमरोहा, झांसी, बुलंदशहर, गाजियाबाद, मथुरा, सीतापुर, बाराबंकी, देवरिया हैं।

रायबरेली और अमेठी में तो वैसे भी समाजवादी पार्टी प्रत्याशी नहीं देती है। इस गठबंधन से वहां कांग्रेस की स्थिति में कोई बदलाव नहीं होगा। हां, ये जरूरी है कि पिछली बार राहुल गांधी को स्मृति ईरानी ने हराया था और इस बार अगर राहुल गांधी मैदान में होते हैं तो मुकाबला जरूर कड़ा हो सकता है। लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा। गांधी परिवार की अनुपस्थिति में कांग्रेस की दावेदारी अमेठी में कमजोर हो जाती है। यही हाल रायबरेली में भी है। सोनिया गांधी राज्यसभा पहुंच चुकी हैं और अब रायबरेली में कौन उम्मीदवार होगा इसे लेकर चर्चाएं हैं। यहां भी गांधी परिवार के अलावा किसी प्रत्याशी को अगर कांग्रेस उतारती है तो कांग्रेस की ताकत कम होगी। कानपुर लोकसभा सीट पर हमेशा से भाजपा और कांग्रेस के बीच मुख्य मुकाबला होता रहा। पिछले 2019 के लोकसभा चुनाव में भी ऐसा ही देखने को मिला। उस चुनाव भाजपा से सत्यदेव पचौरी, कांग्रेस से श्रीप्रकाश जायसवाल ओर सपा से राम कुमार मैदान में थे। सत्यदेव पचौरी को 4 लाख 68 हजार 937 वोट मिले थे। वहीं कांग्रेस को 3 लाख 13 हजार ओर सपा को 48 हजार 275 वोट मिले थे। श्रीप्रकाश जायसवाल के इस बार चुनाव लड़ने को लेकर संशय है। वह 1989 से राजनीति में हैं। पहले कानपुर के मेयर बने, फिर 1999 में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा और जीता। इसके बाद 2004 और 2009 में भी जीत कर संसद पहुंचे। केंद्र में वह गृह राज्य मंत्री और कोयला मंत्री भी रहे, लेकिन 2013 और 2019 के चुनाव में उन्हें हार मिली। फिलहाल उम्र और तबियत के कारण उनके चुनाव लड़ने पर संशय है। लेकिन इसके साथ ही बड़ा सवाल खड़ा होता है कि कांग्रेस यहां से किसे मैदान में उतारती है। वैसे इस सीट पर सपा के साथ गठबंधन करके कांग्रेस को लाभ तो हुआ है लेकिन भाजपा के पिछले चुनावों में प्रदर्शन बता रहे हैं कि गठबंधन को मेहनत बहुत करनी पड़ेगी।

सहारनपुर लोकसभा सीट पर 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन में बसपा के हाजी फजलुर्रहमान ने जीत दर्ज की थी। भाजपा ने यहां कड़ा मुकाबला पेश किया था लेकिन करीब 22 हजार वोट से राघव लखनपाल को हार मिली थी। तीसरे नंबर पर कांग्रेस से इमरान मसूद रहे थे। इस बार यह सीट गठबंधन के तहत कांग्रेस के खाते में आई है। इमरान मसूद 2014 में इस सीट पर दूसरे नंबर पर रहे थे। इस बार भी हाल ही में इमरान मसूद की घर वापसी हुई है। वह यहां से टिकट के बड़े दावेदार हैं। लेकिन इस सीट पर समाजवादी पार्टी का ज्यादा बड़ा जनाधार नहीं है। और मुकाबले में बसपा की दावेदारी को भी कमजोर नहीं कहा जा सकता। मुस्लिम बाहुल्य इस सीट पर दलित वोट बैंक अहम भूमिका निभाता है। भाजपा काफी समय से इस वोट बैंक को टार्गेट कर रही है। कुल मिलाकर मुकाबला अगर त्रिकोणीय हुआ तो भाजपा के लिए राहें आसान होंगीं।

मुरादाबाद में पिछले चुनाव पर नजर डालें तो सपा-बसपा गठबंधन के साथ यहां सपा से एसटी हसन जीत दर्ज करने में सफल रहे थे। चुनाव परिणाम पर नजर डालें तो एसटी हसन को 6 लाख 49 हजार से ज्यादा वोट मिले थे, वहीं भाजपा के कुंवर सर्वेश कुमार साढ़े 5 लाख से कुछ ज्यादा वोट ही हासिल कर सके थे। कांग्रेस ने यहां से इमरान प्रतापगढ़ी को मैदान में उतारा था जो करीब 60 हजार वोट ही जुटा सके थे। इससे पहले 2014 में सर्वेश कुमार ने भाजपा की झोली में ये सीट डाली थी। उस चुनाव में एसटी हसन दूसरे ओर बसपा प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे थे।

आजादी के बाद से कांग्रेस ने इस सीट पर 5 बार, भाजपा ने एक बार ओर सपा ने 4 बार जीत दर्ज की है। लेकिन 2014 के बाद से कांग्रेस का ग्राफ तेजी से गिरा है और बसपा यहां बड़ा फैक्टर है। इस सीट पर 45 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं, वहीं 10 प्रतिशत के करीब दलित वोटर हैं। इसके बाद सैनी मतदाता हैं। 7 प्रतिशत क्षत्रिय, 3 प्रतिशत करीब ब्राह्मण हैं। अब सपा और कांग्रेस में गठजोड़ होने से अखिलेश की स्थिति यहां थोड़ी मजबूत जरूर हुई है। लेकिन मुकाबला में बसपा बड़ा फैक्टर है। जानकारों का मानना है कि अगर मुकाबल त्रिकोणीय हुआ तो भाजपा की राहें आसान होंगी, नहीं तो मुकाबला कड़ा होने जा रहा है।

बात अगर फतेहपुर सीकरी लोकसभा क्षेत्र की करें तो 2009 में ये सीट बनी। पहली बार यहां से बसपा की सीमा उपाध्याय जीतीं लेकिन 2014 में भाजपा के चौधरी बाबूलाल, फिर 2019 में राजकुमार चाहर ने यहां जीत हासिल की।

हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा बसपा गठबंधन जरूर हुआ लेकिन बसपा के श्रीभगवान शर्मा 1 लाख 68 हजार वोट हासिल करने के बावजूद तीसरे स्थान पर रहे। राजबब्बर को उनसे करीब 4 हजार वोट ज्यादा मिले और वह दूसरे नंबर पर आए। सपा का यहां ज्यादा जनाधार नहीं है। माना जा रहा है कि सपा कांग्रेस गठबंधन से कांग्रेस को मजबूती जरूर मिलेगी लेकिन बसपा यहां भी बड़ा फैक्टर है और मुकाबला त्रिकोणीय होने वाला है, जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा।लखनऊ में सपा कांग्रेस मिलकर भाजपा को चुनौती जरूर देंगे। लेकिन जीत हासिल करने के लिए काफी जनाधार की जरूर पड़ेगी। कारण ये है कि राजनाथ सिंह पिछली बार करीब साढ़े तीन लाख वोटों से जीते थे। पूनम सिन्हा और प्रमोद कृष्ण दोनों मिलकर करीब उतने वोट हासिल कर सके थे।

क्या राहुल गांधी की भारत जोड़ों न्याय यात्रा फेल हो चुकी है?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा फेल हो चुकी है या नहीं! देश में लोकसभा चुनाव की हलचल तेज है। बीजेपी ने इस बार 400 पार का टारगेट सेट किया है। पीएम मोदी खुद चुनावी मैदान में है। उधर कांग्रेस को चुनाव से पहले ही एक के बाद झटके लग रहे हैं। कांग्रेस के दिग्गज नेताओं का पार्टी से मोह भंग हो रहा है। वहीं इंडिया गठबंधन से भी कुछ साथी छिटक गए हैं। कांग्रेस ने पिछले साल दिसंबर में हुए विधानसभा चुनावों में जीत की उम्मीद में 2024 के लोकसभा चुनावों समेत अपना पूरा भविष्य दांव पर लगा दिया था। उन्हें लगा कि कुछ हिंदी राज्यों में जीत हासिल हो जाएगी। लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं था, क्योंकि कई चीजें एक साथ दांव पर लगाना कभी अच्छा नहीं होता। कांग्रेस को उम्मीद थी कि उनकी जीत से उनके साथी दलों को भी फायदा होगा, लेकिन अब ऐसा नहीं लग रहा है। पार्टी में फूट पड़ गई है, कई नेता पार्टी छोड़कर जा रहे हैं और उनके सहयोगी दल भी उनसे दूरियां बना रहे हैं। कुछ दलों ने कांग्रेस को नजरअंदाज कर दिया है, भले ही वे पहले कांग्रेस का साथ दे रहे थे। हालांकि, ऐसा करने के पीछे केंद्र सरकार की जांच एजेंसियों का दबाव भी एक कारण है, लेकिन असल समस्या ये है कि कांग्रेस छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में चुनाव हार गई। अगर महाराष्ट्र के नेता अशोक चव्हाण और राजस्थान के आदिवासी नेता महेंद्रजीत मालवीय बीजेपी की तरफ देख रहे हैं और टीएमसी और नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसी पार्टियां भी कांग्रेस से दूरी बनाए हुए हैं, तो इसकी वजह ये है कि कांग्रेस अपने ही भीतर टूट रही है। गलत रणनीतियों और घमंड की वजह से पार्टी इस हाल में पहुंच गई है।

2019 के बाद से भले ही कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही थी, लेकिन पिछले साल मई में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी को कर्नाटक में हराकर उसने वापसी की उम्मीद जगाई थी। बीजेपी का विरोध करने वाली पार्टियां, भले ही वो कांग्रेस के मजबूत होने से सहमत नहीं थीं, लेकिन उन्होंने इस मौके का फायदा उठाते हुए कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया। इसी से ‘इंडिया ब्लॉक’ बना। लेकिन कांग्रेस को लगा कि अगर वो छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जीत लेती है तो उसे और भी फायदा होगा। राजस्थान में हार के बावजूद भी अच्छी स्थिति रहने से ‘कांग्रेस वापस आ गई’ का नारा और मजबूत होता और इसका इस्तेमाल सहयोगी दलों पर दबाव बनाने और अपनी कमजोरियों को दूर करने में मदद मिलती। लेकिन ये सोच गलत साबित हुई और कांग्रेस को एक सुनहरा मौका हाथ से निकल गया।

2019 में मोदी के दोबारा चुनाव जीतने के बाद से कांग्रेस को लगातार नुकसान उठाना पड़ा है। पार्टी के कई मजबूत नेता और जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ता पार्टी छोड़कर चले गए। पिछले साढ़े तीन साल में कांग्रेस हर राज्य चुनाव हारती रही। थोड़ी राहत तब मिली जब दिसंबर 2022 में हिमाचल प्रदेश में पार्टी जीत गई। ये उसी समय हुआ जब मल्लिकार्जुन खड़गे पार्टी अध्यक्ष बने और राहुल गांधी ने कन्याकुमारी से कश्मीर तक भारत जोड़ो यात्रा शुरू की। कर्नाटक में जीत ने कांग्रेस को अपने संगठन को दोबारा बनाने, राज्यवार रणनीति बनाने और गठबंधन तय करने का एक सुनहरा मौका दिया। जीत का समय नेतृत्व दिखाने और पार्टी को मजबूत बनाने का होता है, जिससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ता है। लेकिन पुरानी समझ को नजरअंदाज करते हुए कांग्रेस ने सिर्फ दिसंबर के चुनाव पर ध्यान देने का फैसला किया। राहुल गांधी ने रैलियों और प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया, लेकिन पार्टी ने संगठन को ठीक करने की तरफ ध्यान नहीं दिया। दिसंबर में जब कांग्रेस को बड़ी हार का सामना करना पड़ा, तब तक राज्य इकाइयों ने संगठन को मजबूत करने में कोई खास काम नहीं किया था। खरगे के अध्यक्ष बनने के एक साल बाद भी एआईसीसी में बदलाव नहीं किया गया था, जिससे पार्टी में उत्साह नहीं दिखा। जल्दबाजी में किए गए अधिकांश बदलावों से पार्टी को अब भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

कर्नाटक में जीत के बाद जब कांग्रेस का भाग्य फिर से अच्छा लगने लगा, तो राहुल गांधी की लंबी दाढ़ी और अडानी-मोदी पर उनके हमले सुर्खियों में छाए रहे। लेकिन असली मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया गया। इंडिया ब्लॉक चाहता था कि सीटों का बंटवारा हो और पूरे देश में मिलकर चुनाव लड़ा जाए। लेकिन कांग्रेस ने इस पर टाल-मटोल की, क्योंकि उसे लगा कि मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़-राजस्थान-तेलंगाना चुनाव जीतने के बाद वो बेहतर सौदा कर सकती है। चुनाव हारने के बाद, सहयोगी दलों ने कांग्रेस को रैलियों और सीट-बंटवारे में देरी करने के लिए जिम्मेदार ठहराया, जिससे गठबंधन की रफ्तार धीमी हो गई। नीतीश कुमार और आरएलडी बीजेपी के साथ चले गए। ममता बनर्जी और नेशनल कॉन्फ्रेंस अब कांग्रेस के साथ नहीं जुड़ना चाहते। यहां तक कि महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी, जहां शरद पवार और उद्धव ठाकरे गठबंधन के लिए तैयार हैं, और झारखंड और बिहार में झामुमो और आरजेडी के तेजस्वी यादव के साथ, कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। अब कोई भी गठबंधन देरी से होगा, जबकि बीजेपी पहले से ही अपनी रणनीति और चुनाव अभियान पर जोर दे रही है।

राहुल गांधी की पूर्व से पश्चिम भारत जोड़ो यात्रा को उनकी दक्षिण से उत्तर यात्रा के बाद के कार्यक्रम के रूप में बनाया गया था, लेकिन इसका असली मकसद हिंदी पट्टी में जीत के बाद माहौल को और मजबूत करना था। पिछली यात्रा काफी सफल रही थी, राहुल के रास्ते में भारी भीड़ जुटी थी और उन्होंने ‘मोहब्बत की दुकान’ का नारा दिया था और मोदी सरकार पर हमला बोला था। लेकिन इस बार की यात्रा, जो हार के बाद हुई है, जिसने कर्नाटक की जीत को भी फीका कर दिया है, कुछ खास कमाल नहीं कर पाई है। यह उन इलाकों से होकर गुजरी है, जहां कांग्रेस को अब भी उम्मीद है, जैसे उत्तर बंगाल और असम, बिहार और झारखंड के कुछ हिस्से। लेकिन कांग्रेस में असली चिंता लोकसभा चुनाव के लिए बड़ी चुनावी रणनीति को लेकर है। अब ज्यादातर लोगों को लगता है कि ये यात्रा सही संदेश नहीं दे रही है, ऊपर से बीजेपी सरकारों द्वारा बार-बार रोके जाने और कांग्रेस में आंतरिक समस्याओं ने इसे और कमजोर कर दिया है।

क्या लोकसभा चुनाव से पहले पीएम मोदी ने जनता पर बरसाया है प्यार

लोकसभा चुनाव से पहले पीएम मोदी ने जनता पर प्यार बरसाया है! संसद के बजट सत्र के आखिरी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि 17वीं लोकसभा में कई बड़े फैसले हुए। यह पांच साल देश में रिफॉर्म, परफॉर्म और ट्रांसफॉर्म के थे। उन्होंने सदन के सभी सदस्यों का अभिवादन किया। पीएम मोदी ने कहा कि 17वीं लोकसभा में 5 वर्ष देश सेवा में अनेक महत्वपूर्ण निर्णय किए गए और अनेक चुनौतियों का सामना करते हुए भी सबने अपने सामर्थ्य से देश को उचित दिशा देने का प्रयास किया। पीएम मोदी ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला की तारीफ करते हुए कहा, ‘हर पल आपका चेहरा हमेशा मुस्कान से भरा रहता है, चाहे कुछ भी हो जाए उस मुस्कान में कमी नहीं आई।’ उन्होंने कहा, ‘संसद का नया भवन हो इसकी चर्चा सदन में होती थी, लेकिन इस पर निर्णय नहीं होता था। सभापति महोदय आपके नेतृत्व में इस पर विचार और निर्णय हुआ। इसके बाद अब देश को नया संसद भवन मिला है।’ पीएम मोदी ने कहा, ‘मैं माननीय सांसदों का भी इस बात के लिए आभार व्यक्त करता हूं कि संकट काल में देश की आवश्यकताओं को देखते हुए सांसद निधि छोड़ने का प्रस्ताव जब मैंने माननीय सांसदों के सामने रखा, तो एक पल के विलंब के बिना सभी सांसदों ने इस प्रस्ताव को मान लिया।’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17वीं लोकसभा के आखिरी सत्र के आखिरी दिन सदन द्वारा अयोध्या में बने भव्य राम मंदिर पर पारित किए गए प्रस्ताव को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि आज राम मंदिर को लेकर सदन लोकसभा ने जो प्रस्ताव पारित किया है, वो देश की भावी पीढ़ी को देश के मूल्य पर गर्व करने की संवैधानिक शक्ति देगा। उन्होंने विपक्ष पर कटाक्ष करते हुए यह भी कहा कि यह सही है कि हर किसी में यह सामर्थ्य नहीं होता है, ऐसी चीजों में कोई हिम्मत दिखाते हैं और कुछ लोग मैदान छोड़कर भाग जाते हैं, लेकिन फिर भी भविष्य में रिकॉर्ड को जो देखेंगे तो आज जो प्रस्ताव पास हुआ है, जो बातें रखी गई है, उसमें संवेदना भी है, संकल्प भी है, सहानुभूति भी है और ‘सबका साथ, सबका विकास’ के मंत्र को आगे बढ़ाने का तत्व भी है।पीएम मोदी ने कहा, ‘मैं माननीय सांसदों का भी इस बात के लिए आभार व्यक्त करता हूं कि संकट काल में देश की आवश्यकताओं को देखते हुए सांसद निधि छोड़ने का प्रस्ताव जब मैंने माननीय सांसदों के सामने रखा, तो एक पल के विलंब के बिना सभी सांसदों ने इस प्रस्ताव को मान लिया।’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17वीं लोकसभा के आखिरी सत्र के आखिरी दिन सदन द्वारा अयोध्या में बने भव्य राम मंदिर पर पारित किए गए प्रस्ताव को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि आज राम मंदिर को लेकर सदन (लोकसभा) ने जो प्रस्ताव पारित किया है, वो देश की भावी पीढ़ी को देश के मूल्य पर गर्व करने की संवैधानिक शक्ति देगा। उन्होंने विपक्ष पर कटाक्ष करते हुए यह भी कहा कि यह सही है कि हर किसी में यह सामर्थ्य नहीं होता है, ऐसी चीजों में कोई हिम्मत दिखाते हैं और कुछ लोग मैदान छोड़कर भाग जाते हैं, लेकिन फिर भी भविष्य में रिकॉर्ड को जो देखेंगे तो आज जो प्रस्ताव पास हुआ है, जो बातें रखी गई है, उसमें संवेदना भी है, संकल्प भी है, सहानुभूति भी है और ‘सबका साथ, सबका विकास’ के मंत्र को आगे बढ़ाने का तत्व भी है।

लोकसभा में समापन भाषण देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि कितने ही बुरे दिन क्यों ना गए हों, लेकिन हम भावी पीढ़ी के लिए कुछ ना कुछ अच्छा करते रहेंगे। यह सदन हमें वह प्रेरणा देता रहेगा और हम सामूहिक संकल्प से सामूहिक शक्ति से उत्तम से उत्तम परिणाम के लिए कार्य करते रहेंगे। आगामी लोकसभा चुनाव का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि चुनाव बहुत दूर नहीं है, कुछ लोगों को इससे थोड़ी घबराहट रहती होगी, लेकिन यह लोकतंत्र का सहज और आवश्यक पहलू है। हम सब इसको गर्व से स्वीकार करते हैं और उन्हें विश्वास है कि हमारे चुनाव भी देश की शान बढ़ाने वाले होंगे। लोकतंत्र की हमारी जो परंपरा है, पूरे विश्व को अचंभित करने वाली, वह अवश्य रहेंगी, यह उनका पक्का विश्वास है। उन्होंने कहा कि कभी-कभी उन पर बड़े मजेदार हमले भी हुए हैं, लेकिन ऐसे हर हमले पर उनके अंदर की शक्ति मजबूती से सामने आई।

प्रधानमंत्री मोदी ने वर्तमान 17वीं लोकसभा के पांच वर्षों के दौरान दर्ज की गई कई उपलब्धियों का जिक्र करते हुए कहा है कि वर्तमान लोकसभा के पांच वर्ष देश में रिफॉर्म, परफॉर्म एंड ट्रांसफॉर्म के वर्ष रहे हैं और उन्हें पूरा यकीन है कि देश इस 17वीं लोकसभा को आशीर्वाद देता रहेगा। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद 75 वर्षों तक हमारी न्याय व्यवस्था अंग्रेजों के बनाए नियमों से तय होती रही। लेकिन, अब हमारी आने वाली पीढ़ियां गर्व से कहेंगी कि हम उस समाज में रहते हैं जो दंड संहिता नहीं बल्कि न्याय सहिंता को मानता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने शनिवार को कहा कि आज देश में यह जज्बा पैदा हुआ है कि अगले 25 वर्ष में भारत एक विकसित देश बनाने का सपना पूरा करना है। उन्होंने 17वीं लोकसभा के आखिरी सत्र के अंतिम दिन सदन में यह भी कहा कि अगली लोकसभा में कामकाज की 100 प्रतिशत उत्पादकता का संकल्प लेना चाहिए। प्रधानमंत्री ने 17वीं लोकसभा में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने, महिला आरक्षण कानून बनाने, तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाने, नए आपराधिक कानूनों समेत कई विधेयकों के पारित होने का उल्लेख किया। मोदी ने कहा, ‘सदन ने अनुच्छेद 370 हटाया जिससे संविधान का पूर्ण रूप से प्रकटीकरण हुआ…संविधान निर्माताओं की आत्मा हमें जरूर आशीर्वाद दे रही होगी।’

प्रधानमंत्री ने कहा, ‘इस कार्यकाल में परिवर्तनकारी सुधार हुए, 21वीं सदी के भारत की मजबूत नींव इनमें नजर आती है।’ उन्होंने कहा, ‘17वीं लोकसभा की कार्य उत्पादकता 97 प्रतिशत रही, मुझे विश्वास है कि हम 18वीं लोकसभा में शत प्रतिशत की उत्पादकता रहने का संकल्प लेंगे।’ मोदी का कहना था कि जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान देश के हर राज्य ने भारत के सामर्थ्य और अपने प्रदेश की खूबी विश्व के सामने रखी जिसका असर आज भी है तथा ‘पी-20’ के माध्यम से भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत किया गया। उन्होंने संसद के नए भवन का निर्माण करवाने का निर्णय लेने का श्रेय लोकसभा अध्यक्ष बिरला को देते हुए कहा कि उसी का परिणाम है कि देश को संसद का नया भवन प्राप्त हुआ।

आखिर क्या है विपक्ष का बिखरने से लेकर एक होने का रास्ता?

आज हम आपको विपक्ष का बिखरने से लेकर एक होने का रास्ता बताने जा रहे हैं! शनिवार को 17वीं लोकसभा का अंतिम सत्र संपन्न हो गया। अगर पिछले पांच सालों को विपक्ष के नजरिए से देखा जाए तो जून 2019 में बीजेपी की प्रचंड जीत के सामने विपक्ष था तो लेकिन बिखरा-बिखरा सा। पूरी ताकत लगाने के बाद भी प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस नेता प्रतिपक्ष का दर्जा नहीं पा सकी। इस बीच पांच साल तक लगातार अलग-अलग दलों से लेकर नेताओं की ओर से विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश होती रही। कभी बिहार में जेडीयू अध्यक्ष नीतीश कुमार तो कभी एनसीपी चीफ शरद पवार, कभी टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी तो कभी बीआरएस प्रमुख केसीआर। लेकिन इन पांच सालों में जिन भी बड़े नेताओं की ओर से विपक्षी एकजुटता की कोशिश हुई, उसका अपना घर बिखर गया या उसने खुद ही पाला बदल लिया। नीतीश कुमार एनडीए का हिस्सा बन गए तो पवार के यहां टूट हो गई। वहीं उद्धव ठाकरे की शिवसेना भी टूट गई। जबकि केसीआर भी एनडीए के साथ जाने की तैयारी में हैं। धारा 370, महिला आरक्षण बिल, नई संसद और हाल ही में राम मंदिर का उद्घाटन जैसी ऐतिहासिक उपलब्धियों पर सवार बीजेपी के सामने विपक्ष बिखरा सा नजर आ रहा है। नीतीश कुमार के जाने के बाद आरएलडी के निकलने की संभावनाओं के बीच इंडिया गठबंधन लगातार कमजोर दिख रहा है। ममता बनर्जी का ‘एकला चलो’ का फैसला और यूपी में अखिलेश और दिल्ली-पंजाब में आप के साथ कांग्रेस की बात न बन पाना कहीं न कहीं कमजोर व बिखरे विपक्ष की बानगी बन रहा है। विपक्षी दल लगातार ईडी, सीबीआई व इनकम टैक्स जैसी एजेंसियों के इस्तेमाल के जरिए सरकार पर विपक्ष को कमजोर करने का आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस महंगाई व रोजगार के मुद्दे पर सरकार को घेर रही है तो वहीं सामाजिक न्याय के तहत छह सामाजिक न्याय की बात करती है, लेकिन बीजेपी ने पीएम मोदी की गारंटीज देकर उसे काउंटर करने की कोशिश की है। हालांकि उत्तर भारत में बीजेपी के प्रभाव को देखते हुए दक्षिण में विपक्ष अपनी रणनीति बनाकर मजबूत दिखने की कोशिश कर रहा है। कांग्रेस, लेफ्ट व डीएमके जैसे दल वहां अपना किला बचाने की कोशिश में लगे हैं। यह बात और है कि बीजेपी अपनी रणनीति व कूटनीति से वहां भी अपने लिए जमीन तलाशने की जद्दोजहद में दिख रही है। चुनाव में 100 दिन से भी कम समय बचने के बावजूद विपक्ष के बीच न ताे अभी तक मुद्दाें पर एकजुटता बन पाई है और न ही सीटों के बंटवारे पर चीजें फाइनल हुई हैं। न तो संयुक्त रणनीति सामने आ पाई है और न ही संयुक्त प्रचार शुरू हुआ है। कह रही है कि इन एजेंसियों के इस्तेमाल से सरकार विपक्षी दलों को डराने या दबाव डालने का काम कर रही है।

17वीं लोकसभा में विपक्षी सांसदों ने संसद में बड़े पैमाने पर निष्कासन और निलंबन देखा। एक तरफ राहुल गांधी भारत जोड़ो न्याय यात्रा निकाल रहे हैं तो दूसरी ओर इंडिया गठबंधन के घटक दलों बदलते रुख और मिजाज से विपक्षी एकजुटता ठंडी पड़ती दिख रही है। इंडिया गठबंधन का प्रमुख दल होने के बावजूद ज्यादातर घटक दल कांग्रेस ने नाराज दिख रहे हैं। कांग्रेस सबको साधने व साथ लेकर चलने में नाराज दिख रही हैं। विपक्ष धर्म व जाति के नाम पर बीजेपी पर समाज को बांटने का आरोप लगाते हुए देश की इकोनमी को लेकर बीजेपी व मोदी सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है, लेकिन मोदी सरकार ने आखिरी सत्र के आखिर में यूपीए सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर कांग्रेस पर पलटवार करने की कोशिश की है।

कांग्रेस महंगाई व रोजगार के मुद्दे पर सरकार को घेर रही है तो वहीं सामाजिक न्याय के तहत छह सामाजिक न्याय की बात करती है, लेकिन बीजेपी ने पीएम मोदी की गारंटीज देकर उसे काउंटर करने की कोशिश की है। हालांकि उत्तर भारत में बीजेपी के प्रभाव को देखते हुए दक्षिण में विपक्ष अपनी रणनीति बनाकर मजबूत दिखने की कोशिश कर रहा है। कांग्रेस, लेफ्ट व डीएमके जैसे दल वहां अपना किला बचाने की कोशिश में लगे हैं। यह बात और है कि बीजेपी अपनी रणनीति व कूटनीति से वहां भी अपने लिए जमीन तलाशने की जद्दोजहद में दिख रही है। चुनाव में 100 दिन से भी कम समय बचने के बावजूद विपक्ष के बीच न ताे अभी तक मुद्दाें पर एकजुटता बन पाई है और न ही सीटों के बंटवारे पर चीजें फाइनल हुई हैं। न तो संयुक्त रणनीति सामने आ पाई है और न ही संयुक्त प्रचार शुरू हुआ है।

क्या दिल्ली की लोकसभा सीट को लेकर नाराज हो सकती है कांग्रेस?

आने वाले समय में कांग्रेस दिल्ली की लोकसभा सीट को लेकर नाराज हो सकती है ! लोकसभा चुनाव की तारीख नजदीक आते-आते भारतीय जनता पार्टी बीजेपी के खिलाफ बना इंडिया गठबंधन अब खत्म होने के कगार पर पहुंच चुका है। पंजाब में लोकसभा के सभी सीटों पर अपने कैंडिडेट देने की घोषणा के बाद दिल्ली की सतारूढ़ आम आदमी पार्टी ने अब राजधानी में भी ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस को बैकफुट पर धकेलने की रणनीति में जुट गई है। पार्टी ने दिल्ली की 7 सीटों में से केवल एक सीट ही कांग्रेस को ऑफर की है। देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए ये किसी झटका से कम नहीं है। आप के ऑफर पर स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं में काफी रोष है। स्थानीय वर्कर तो इसे पार्टी के लिए बेइज्जती तक करार दे रहे हैं। आप के ऑफर के बाद दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली ने कहा कि इसपर आलाकमान से बात कर फैसला किया जाएगा। लेकिन जिस तरह से आप ने कांग्रेस को राजधानी दिल्ली में महज एक सीट का ऑफर दिया है, इसे देखते हुए साफ कहा जा सकता है कि देर-सबेर दिल्ली में भी आप और कांग्रेस के रास्ते अलग हो सकते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 46.40 प्रतिशत था। वहीं, आप को उस चुनाव में करीब 33 प्रतिशत वोट मिले थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 57 प्रतिशत हो गया था। आप का वोट प्रतिशत इस दौरान घटकर 18 फीसदी आ गया था। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 22.5 फीसदी वोट मिले थे। इंडिया टुडे के हाल में किए गए मूड ऑफ द नेशन सर्वे में जो आंकड़े आए थे वो भी चौंकाने वाले थे। इसके अनुसार अगर अभी राज्य में लोकसभा चुनाव हो जाए तो बीजेपी को को 56.6 प्रतिशत वोट मिल सकते हैं जबकि कांग्रेस इस बार दूसरे नंबर पर रहेगी और उसे 25.3 फीसदी वोट मिलने की उम्मीद है। वहीं आप को महज 14.9 प्रतिशत वोट ही मिल पाएगा।

2014 को लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी ने सभी 7 सीटों पर जीत दर्ज की थी। उसे कुल 46.63 प्रतिशत वोट मिले थे। 16वीं लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सभी सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था और उसका वोट प्रतिशत 15.22 रहा था। वहीं आप को भी सभी सीटों पर हार मिली थी लेकिन उसका वोट प्रतिशत कांग्रेस से ज्यादा था। आप को 33.08 प्रतिशत वोट मिले थे। हालांकि, 2019 के संसदीय चुनावों में, कांग्रेस ने आप से बेहतर प्रदर्शन किया, सात में से पांच सीटों पर दूसरा नंबर पर रही थी, जबकि आप केवल दो सीटों पर ही दूसरे नंबर पर रही थी। लेकिन अगर लोकसभा चुनाव की बात करें तो 2019 के आम चुनाव में दिल्ली में कांग्रेस ने आप से बेहतर प्रदर्शन किया था। बीजेपी ने पिछले चुनाव में सभी 7 सीटों पर जीत दर्ज की थी और उसे कुल 56.9 प्रतिशत वोट मिले थे। बीजेपी को कुल 4,908,541 लाख वोट मिले थे। कांग्रेस को 2019 के चुनाव में 22.5 प्रतिशत वोट मिले थे और उसे कुल 1,953,900 लाख वोट मिले। वहीं, आप को पिछले लोकसभा चुनाव में 18.1 फीसदी वोट मिले थे और उसे कुल 1,571,687 लाख वोट मिले थे।

एक वक्त था जब दिल्ली में शीला दीक्षित के समय में राजधानी में कांग्रेस का बोलबाला था। पार्टी लगातार तीन बार राज्य की सत्ता में आई थी। लेकिन आप के उदय और शीला सरकार के पतन के बाद कांग्रेस धीरे-धीरे राजधानी में अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। पिछले दो बार के विधानसभा चुनाव में तो पार्टी अपना खाता तक नहीं खोल पाई। आप के नेता संदीप पाठक ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में सीट बंटवारे में देरी के कारण आप दिल्ली की 6 लोकसभा सीटों पर अपने कैंडिडेट का ऐलान करने के लिए मजबूर होगी। ऐसे में कांग्रेस के लिए केवल एक ही सीट बचेगी। आप नेता ने कहा, कांग्रेस के पास लोकसभा में शून्य सीटें और विधानसभा में शून्य सीटें हैं। पिछले साल एमसीडी चुनावों में, कांग्रेस ने 250 में से नौ वार्ड जीते थे। यदि आप योग्यता के आधार पर और आंकड़ों के आधार पर देखें, तो कांग्रेस एक सीट की भी हकदार नहीं है। लेकिन गठबंधन धर्म का ध्यान रखते हुए हम उन्हें एक सीट की पेशकश करते हैं। लेकिन कांग्रेस इस बेइज्जती को सहन करने के मूड में नहीं है। पार्टी के कार्यकर्ता इस बात के लिए राजी ही नहीं है। ऐसे में कांग्रेस आप के दिल्ली वाले ऑफर को स्वीकार करे इस बात की संभावना बेहद कम लगती है। जिस तरह आप ने एकतरफा फैसला लेते हुए उसे महज एक सीट देने की बात कही है उससे दोनों दलों के बीच रिश्ते में भी कड़वे हो सकते हैं।

आप ने कांग्रेस को केवल एक सीट का ऑफर देने के पीछे विधानसभा और एमसीडी चुनावों का भी हवाला दिया। आप नेता ने कहा कि कांग्रेस ने 250 वार्डों में से कांग्रेस ने 2022 में केवल 9 सीट ही जीत पाई थी। जबकि विधानसभा चुनावों में तो पिछले दो बार से कांग्रेस अपना खाता तक नहीं खोल पाई है। आप ने तो यहां तक कह दिया कि मौजूदा आंकड़ों के हिसाब से तो कांग्रेस पार्टी एक सीट की भी हकदार नहीं है।

जिस तरीके इंडिया गठबंधन के दलों में अभी तनातनी चल रही है ऐसे में साफ कहा जा सकता है कि ये गठबंधन फिलहाल तो नाम की ही रह गई है। दिल्ली में आप के ऑफर के बाद तो साफ कहा जा सकता है कि यहां भी दोनों दलों के बीच गठबंधन की उम्मीदें सफल होती नहीं दिख रही है। पार्टी के कई नेता दबी जुबान स्वीकार कर रहे हैं कि आप का ऑफर मंजूर होना संभव नहीं है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि ये लोकसभा चुनाव है और कांग्रेस एक राष्ट्रीय दल है। इसके अलावा 2019 के चुनाव में पार्टी 5 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी। ऐसे में 2024 के लोकसभा चुनाव में केवल एक सीट पर वह लड़ने की सोच भी नहीं सकती है।

क्या गुजरात में अहमद पटेल की सीट पर दाव खेल रहे हैं केजरीवाल?

सीएम केजरीवाल अब गुजरात में अहमद पटेल की सीट पर दाव खेल रहे हैं! कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के मिलकर लड़ने से राज्य की भरूच लोकसभा सीट को लेकर राजनीति गरमा गई है। आम आदमी पार्टी ने इस लोकसभा क्षेत्र में आने वाली डेडियापाडा से विधायक चैतर वसावा को उम्मीदवार घोषित किया है। I.N.D.I.A अलायंस में यह सीट आप को खाते में जाते देखकर दिग्गज कांग्रेसी नेता रहे दिवंगत अहमद पटेल के बेटे फैजल पटेल ने समर्थन नहीं करने का ऐलान किया है। इस सीट से अहमद पटेल की बेटी मुमताज लड़ने की तैयारी कर रही थीं। अहमद पटेल के बेटे ने भले ही नाराजगी जताई है लेकिन गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष शक्ति सिंह गोहिल का कहना है कि केंद्रीय नेतृत्व जो भी फैसला करेगा। प्रदेश कांग्रेस समिति उसे स्वीकार करेगी। गुजरात में आम आदमी पार्टी 2 से 3 सीटों पर लड़ सकती है। पार्टी ने अभी भरूच और भावनगर की सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए हैं। समझते हैं कि भरूच में आप बीजेपी को टक्कर दे सकती है। भरूच लोकसभा सीट से कांग्रेस आखिरी बार 1984 में जीत हासिल की थी। पार्टी के नेता अहमद पटेल तब यहां से तीसरी बार सांसद चुने गए थे, लेकिन इसके बाद से पार्टी यहां पर 10 लोकसभा चुनाव हार चुकी है। 18 वीं लोकसभा चुनावों में आप यहां से बीजेपी को टक्कर देना चाहती है। आप को भरोसा है कि वह बीजेपी को रोक सकती है। कांग्रेस 10 बार कोशिश कर चुकी है, इसलिए उसे यह सीट मिलनी चाहिए। अहमद पटेल को इस सीट पर चंदूभाई देशमुख ने हराया था। वे लगातार चार बार जीते। इसके बाद से इस लोकसभा सीट पर बीजेपी नेता मनसुख वसावा का एकछत्र राज है। वे छह बार जीत चुके हैं और सातवीं बार के लिए मैदान उतरने के तैयार हैं, तो वहीं आप आदमी पार्टी को लगता है कि इस सीट पर आप जीत मिलती है तो बीजेपी के अजेय होने के मिथक को तोड़ा जा सकेगा। इससे पूरे राज्य के कार्यकर्ताओं में अलग जोश आएगा। यही वजह है कि आप इस सीट पर अपनी दावेदारी को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। केजरीवाल ने पिछले महीने की 7 जनवरी को खुद भरुच पहुंचकर पार्टी की तरफ चैतर वसावा को उम्मीदवार घोषित किया था।

भरूच में अगर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी मिलकर लड़ते हैं तो इस सीट पर पहली बीजेपी को कड़ी टक्कर मिलने की संभावना है। दो साल पहले हुए विधानसभा चुनावों में लोकसभा के 6 विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी को कुल 6,16,461 वोट मिले, जबकि कांग्रेस को 3,19,131 और आप के खाते में 154,954 वोट आए थे। अगर आप और कांग्रेस वोटों को मिला दें तो बीजेपी से मतों का अंतर 1,42,376 रह जाता है। अगर इसमें झगड़िया से लड़े निर्दलीय उम्मीवार और दिग्गज आदिवासी नेता छोटू वसावा को मिले वोटों को आप और कांग्रेस पक्ष के साथ जोड़ दें तो बीजेपी और I.N.D.I.A अलायंस के बीच मतों का फासला एक लाख वोट से नीचे आकर 75, 943 मतों का रह जाता है। आप ने जिन चैतर वसावा को भरूच से लोकसभा का कैंडिडेट घोषित किया है। उन्होंनें राजनीति की एबीसीडी… छोटू भाई वसावा की शार्गिदी में रहकर ही सीखी है। एक तरह से छोटू वसावा उनके राजनीतिक गुरू हैं। वे अपने चेले का समर्थन करेंगे या फिर नहीं। यह एक बड़ा फैक्टर होगा।

भरूच की सीट पर कांग्रेस और आप के संयुक्त प्रत्याशी उतारने की स्थिति में बीजेपी का वह सपना टूट सकता है। जिसमें पार्टी ने राज्य की सभी लोकसभा सीटों को पांच लाख से अधिक मतों के अंतर से जीतने की रणनीति बनाई है। यह संकल्प गुजरात बीजेपी के सफलतम् अध्यक्ष सी आर पाटिल ने लिया है। अब देखना यह है कि बीजेपी यहां अपने बुजुर्ग सांसद को बरकरार रखती है, या फिर चैतर वसावा के मुकाबले में किसी युवा चेहरे को उतारती है। पिछले दिनों यहां से पूर्व सांसद रहे चंदूभाई देशमुख की बेटी और वर्तमान में विधायक दर्शना देशमुख के लड़ने की चर्चा भी सामने आ चुकी है। इसके अलावा संगठन के एक व्यक्ति को मनसुख वसावा का रिप्लेसमेंट माना जा रहा है।

पिछले लोकसभा चुनावों में मनसुख वसावा ने भरूच लोकसभा सीट से 3,34,214 वोटों से कांग्रेस के उम्मीदवार शेरखान अब्दुलशकूर पठान को हराया था। तब उस चुनाव में झगड़िया के विधायक रहे छोटू वसावा को 1,44,083 वोट मिले थे। 2024 में अगर यहां से कांग्रेस और आप का संयुक्त प्रत्याशी लड़ता है तो ऐसे में छोटू वसावा बड़े फैक्टर होंगे। साथ ही साथ अगर बीजेपी विरोधी मतों का धुव्रीकरण हुआ तो बीजेपी का पांच लाख वोटों से जीतने का टारगेट खटाई में पड़ सकता है। बीजेपी के लिए भरुच लोकसभा सीट उन सीटों में शामिल हैं जहां पर पार्टी 90 के दशक से पहले कड़ी मेहनत करके इस सीट पर कमल खिलाया था। इसके बाद गुजरात में बीजेपी का वर्चस्व बढ़ा था। तब इस सीट पर कांग्रेस अहमद पटेल को शिकस्त देने के लिए मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस वक्त पार्टी के नेता रहे नलिन भट्‌ट के साथ मिलकर एक मजबूत रणनीति बनाई थी। जिसका अहमद पटेल अपने पूरे जीवन में नहीं तोड़ पाए।

क्या गुजरात में आम आदमी पार्टी ने चल दिया है आदिवासी का दाव?

वर्तमान में गुजरात में आम आदमी पार्टी ने आदिवासी का दाव चल दिया है! 2024 लोकसभा चुनावों के लिए आम आदमी पार्टी आप ने गुजरात में आदिवासी और ओबीसी दांव खेला है। कांग्रेस के साथ हुए गठबंधन में आप भरूच और भावनगर की सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जबकि बाकी 24 सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार बीजेपी से मुकाबला करेंगे। I.N.D.I.A अलायंस के तहत साथ आई दोनों पार्टियों का गठबंधन कितना सफल होगा? इसका फैसला लोकसभा चुनाव के नतीजों में होगा, लेकिन आम आदमी पार्टी ने फिलहाल दो सीटों पर बीजेपी के सामने कड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। गुजरात में पिछले दो चुनावों से क्लीन स्वीप कर रही बीजेपी ने इस सभी 26 सीटों को पांच लाख वोटों के अंतर से जीतने का लक्ष्य रखा था। आप-कांग्रेस के साथ आने से बीजेपी को निश्चित तौर पर अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटिल ने गुजरात में पार्टी को क्लीन स्वीप से रोकने को दिन में सपने देखना जैसा बताया है, तो वहीं आम आदमी पार्टी के प्रदेश प्रमुख इसुदान गढ़वी ने कहा कि गुजरात में कांग्रेस और आप के गठबंधन के बाद बीजेपी 26 सीटें नहीं जीत पाएगी। आम आदमी पार्टी भरूच लोकसभा सीट से पार्टी के सबसे चर्चित और युवा विधायक चैतर वसावा को उम्मीदवार बनाया है। वसावा जेल से छूटने के बाद स्वाभिमान यात्रा निकाल रहे हैं। इसमें पार्टी की ओर से स्लाेगन दिया गया है ‘भरुच में चैतर वसावा ही चलेगा’, तो वाली भावनगर लोकसभा सीट पर पार्टी ने अपने बोटाद के विधायक उमेश मकवाणा को उम्मीदवार बनाया है। मकवाणा कोली समाज से आते है। भरूच में वसावा समुदाय की आबादी करीब 38 फीसदी तक है। भावनगर में काेली समाज की भागीदारी सर्वाधिक है। अब देखना होगा कि बीजेपी का आप की चुनौती से कैसे निपटती है? आम आदमी पार्टी के दोनों उम्मीदवारों ने I.N.D.I.A अलायंस से प्रत्याशी बनाए जाने पर आभार व्यक्त किया है। भरूच में अहमद पटेल के परिवार की नाराजगी के बीच चैतर वसावा ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। वसावा ने कहा वह कांग्रेस नेतृत्व के आभारी हैं। वसावा ने कहा कि वे भरूच सीट जीतकर अहमद पटेल को श्रद्धाजंलि देंगे। भरूच सीट आप को मिलने और चैतर वसावा की उम्मीदवारी निश्चित होने के बाद चर्चा है कि बीजेपी क्या बदलाव करेगी? या फिर पुराने चेहरे के साथ आगे बढ़ेगी, क्योंकि आम आदमी पार्टी के चुनाव लड़ने का तरीक कांग्रेस से अलग है।

भरूच सीट पर बीजेपी लगातार 10 चुनाव जीत चुकी है। कांग्रेस के दिवंगत नेता अहमद पटेल के परिवार का दावा जो भी हो, लेकिन केंद्र में जब कांग्रेस मजबूत थी और राज्य की सत्ता पर काबिज थी। तब भी भरुच की सीट पर कांग्रेस वापसी नहीं कर पाई। पार्टी की भरुच में लगातार स्थिति कमजोर होगी गई। भरुच से अभी बीजेपी के आदिवासी नेता मनसुख वसावा 66 सांसद हैं। वे लगातार छह बार जीत चुके हैं। अगर पार्टी उन्हें फिर से मैदान में उतारती है तो भरूच सीट पर वसावा बनाम वसावा की लड़ाई होगी। भावनगर सीट पर भी लंबे समय से बीजेपी काबिज है। यहां अभी भारतीबेन शियाल सांसद हैं। वे ओबीसी से आती हैं। यहां से बीजेपी की तरफ से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया के लड़ने की प्रबल संभावना हैं। वे पाटीदार समुदाय से आते हैं। ऐसे में राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि क्या गुजरात की आप की निशाने पर दो मनसुख होंगे या फिर बीजेपी अब नए समीकरणों में अपनी योजना में बदलाव करेगी।

आम आदमी पार्टी ने गुजरात दोनों कठिन सीटों पर दांव खेला है। भरुच की सीट पर बीजेपी 1989 से काबिज है तो वहीं भावनगर की सीट 1991 से बीजेपी के पास है। एक और रोचक तथ्य यह है कि भरूच जहां कांग्रेस के दिवंगत नेता अहमद पटेल से जुड़ी हुई तो वहीं भावनगर की सीट गुजरात कांग्रेस मौजूद अध्यक्ष शक्ति सिंह गोहिल का गृह जनपद है। वसावा ने कहा वह कांग्रेस नेतृत्व के आभारी हैं। वसावा ने कहा कि वे भरूच सीट जीतकर अहमद पटेल को श्रद्धाजंलि देंगे। भरूच सीट आप को मिलने और चैतर वसावा की उम्मीदवारी निश्चित होने के बाद चर्चा है कि बीजेपी क्या बदलाव करेगी? या फिर पुराने चेहरे के साथ आगे बढ़ेगी, क्योंकि आम आदमी पार्टी के चुनाव लड़ने का तरीक कांग्रेस से अलग है।1990 में गोहिल भावनगर दक्षिण से जीतकर ही विधानसभा पहुंचे थे और मंत्री बने थे। अब देखना है कि आप को कांग्रेस के दो दिग्गजों के इलाकों में कितना सपोर्ट मिलता है। आप की चुनौती इसी पर टिकी हुई है।

क्या आप और सपा की सीट शेयरिंग से नाराज है कुछ खास लोग?

आप और सपा की सीट शेयरिंग से कुछ खास लोग नाराज हो चुके हैं! कांग्रेस और आम आदमी पार्टी आप के बीच चुनावी तालमेल फाइनल होने के बाद शनिवार को दोनों दलों ने दिल्ली में अपने तालमेल और सीट बंटवारे का ऐलान किया। इसमें पांच राज्यों की कुल 46 सीटों को लेकर तालमेल हुआ, जिसमें से सात सीटों पर आप और 39 सीटों पर कांग्रेस बतौर इंडिया गठबंधन चुनाव लडेंगी। जिन राज्यों में तालमेल हुआ है, उसमें दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, गोवा व चडीगढ़ शामिल हैं। आप दिल्ली की चार, हरियाणा में एक व गुजरात में दो सीटों पर लड़ेंगी। इसके अलावा, असम को लेकर भी दोनों दलों के बीच तालमेल को लेकर बात चल रही है। कहा जा रहा है कि वहां दोनों चुनावी संभावनाएं टटोल रहे हैं।हालांकि इस तालमेल को लेकर दोनों दलों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि दिल्ली सहित गोवा, गुजरात में एक दूसरे के खिलाफ लड़ते आए इन दोनों ही पार्टियों के कार्यकर्ता कितना एक दूसरे के साथ आ पाएंगे, यह देखने वाली बात होगी। वहीं इन दोनों दलों के बीच आपसी आपसी भरोसे की कमी भी एक बड़ा मुद्दा है, जिसका इशारा बीजेपी भी कर रही है। लेकिन फिलहाल घटक दलों के नेताओं का कहना है कि बीजेपी के सामने कांग्रेस या आम आदमी पार्टी नहीं बल्कि इंडिया गठबंधन लड़ रहा है। वहीं पंजाब में दोनों ही दलों ने मिलकर अलग-अलग चुनाव लड़ने का फैसला किया है। बात अगर गुजरात की करें तो कांग्रेस ने वहां भरूच व भावनगर की सीट आप को दी है। 2019 में राज्य की सभी 26 सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी, जबकि कांग्रेस नंबर दो पर रही थी। वोटों की बात की जाए तो बीजेपी को उस चुनाव में 63 फ़ीसदी से ज्यादा तो कांग्रेस को 32.6 फ़ीसदी वोट मिले थे। जबकि आप तब मैदान में ही नहीं थी। वहीं 2022 के असेंबली चुनाव में बीजेपी सभी 182 सीटों पर लड़ी, जबकि कांग्रेस एनसीपी के साथ मिलकर 181 सीटों पर और आम आदमी पार्टी 180 सीटों पर लड़ी। इस चुनाव में बीजेपी को 52.5 फ़ीसदी वोट और 156 सीटें आईं, जबकि कांग्रेस को 27.28 फीसदी वोट और 17 सीटें मिलीं तो वही आपको 12.9 फीसदी वोट और पांच सीटें मिलीं। कहा जा रहा है कि पिछले असेंबली चुनाव में 12 फ़ीसदी से ज्यादा वोट प्रतिशत के आधार पर ही आम आदमी पार्टी वहां दो सीटों का दावा कर रही है। गौरतलब है कि दोनों ही सीटों पर आप ने अपने मौजूदा विधायकों को मैदान में उतारा है। भरूच से ट्राइबल चेहरा चैतर वसावा हैं तो वहीं भावनगर से ओबीसी नेता व उमेश मकवाणा। दोनों ही सीटों पर बीजेपी का कब्जा पिछले तीन दशकों से बना हुआ है। जहां भरूच सीट पर आदिवासी सीटों का बाहुल्य है तो भावनगर में ओबीसी का। 38 फीसदी एसटी बहुल सीट पर बीजेपी के मनसुख वसावा सांसद हैं। जबकि भावनगर में बीजेपी की ओबीसी चेहरा भारतीबेन शियाल सांसद हैं। मकवाधा कोली समाजसे आते हैं, जिसकी तादाद इस इलाके पर ठीक-ठीक है। हालांकि भरूच कांग्रेस के दिग्गज नेता अहमद पटेल का गढ़ रहा है, जहां से उनका परिवार भी दावेदारी कर रहा है।

हरियाणा में पिछली बार कांग्रेस प्रदेश की सभी दस सीटों पर नंबर 2 पर रही थी। पिछले चुनाव में आम आदमी पार्टी अजय चौटाला व दुष्यंत चौटाला की जेजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी। जिसमें 7 सीटों पर जेजेपी और तीन सीटों पर आम आदमी पार्टी मुकाबले में थी। पिछले लोकसभा चुनाव में जहां बीजेपी को 58 फ़ीसदी, कांग्रेस को 28.4 जबकि आप को नगण्य ने वोट मिले थे। पिछली बार आप अंबाला, फरीदाबाद और करनाल से लड़ी थी। . उसी साल हुए असेंबली चुनाव में आम आदमी पार्टी ने अपनी उम्मीदवार नहीं उतारे तो वहीं दूसरी ओर कांग्रेस इस बार भी 28 फ़ीसदी से ज्यादा वोट पाने में कामयाब रही। इस आधार पर कांग्रेस ने नौ और आप ने एक सीट कुरुक्षेत्र की लेना तय किया है। हरियाण के लिए माना जाता है कि यह आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल का गृह प्रदेश है। दिल्ली व पंजाब के बीच स्थित इस राज्य में अपनी जगह बनाने के लिए आप काफी जद्दोजहद कर रही है।

पिछले लोकसभा चुनाव में गोवा की दो सीटों में से एक कांग्रेस और एक बीजेपी को मिली थी। बीजेपी को जहां 51 फ़ीसदी से ज्यादा वोट मिले थे तो वहीं कांग्रेस को लगभग 43 फीसदी, जबकि आम आदमी पार्टी ने दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली। 2019 में वोटो के हिसाब से उसकी भागीदारी 3.1 फीसदी रही थी। 2022 के विधानसभा चुनाव में गोवा की 40 सीटों के लिए कांग्रेस ने गोवा फॉरवर्ड पार्टी के साथ चुनाव लड़ा था, जबकि आम आदमी पार्टी ने 39 सीटों पर मुकाबले में थी। बीजेपी के 33 फ़ीसदी वोट 20 सीट के सामने कांग्रेस को 23.5 फ़ीसदी वोट के साथ 11 सीटें और आम आदमी पार्टी को 6.7 वोट के साथ दो सीटें मिली थीं. पिछले दोनों ही चुनावेां में कांग्रेस के प्रदर्शन को देखते हुए वहां आम आदमी पार्टी ने अपना उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया है।भले ही हालिया घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद चंडीगढ़ में आम आदमी पार्टी अपना मेयर बनने में कामयाब रही हो, लेकिन चुनावी तालमेल में इस सीट से कांग्रेस का उतरना तय हुआ है। दरअसल 2019 में यह सीट बीजेपी के खाते में आई थी, जहां उसे 51 फ़ीसदी से ज्यादा वोट मिले थे। कांग्रेस यहां नंबर दो की स्थिति पर थी, जहां उसे 40.7 और आप को 1.6 फीसदी वोट मिले थे। बीजेपी से पहले यहां से कांग्रेस ही जीतती रही है।

आप के साथ कांग्रेस के तालमेल के बाद कांग्रेस के भीतर से नेताओं के असंतोष के सुर उभर रहे हैं। जहां भरूच में अहमद पटेल के बेटे फैसल अपने पिता की विरासत आसानी से छोड़ने के लिए तैयार नहीं है और भरूच के 25 फीसदी मुस्लिम वोटों के सहारे निर्दलीय लडने की बात कर रहे हैं तो वहीं यूपी में दिग्गज नेता सलमान खुर्शीद फरुर्खाबाद की अपनी सीट न बचा पाने से बैचेन व नाराज हैं। इन नेताओं के लिए बीजेपी को रोकने के लिए इंडिया गठबंधन के तौर पर साथ उतरने के लक्ष्य से ज्यादा अहम अपने राजनीतिक हित अहम हो रहे हैं।

बॉलीवुड फिल्म आर्टिकल 370 की समीक्षा.

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गेंद इंग्लैंड के गोल की ओर बढ़ रही है. माराडोना प्रतिद्वंद्वी के पेनल्टी बॉक्स की ओर भी दौड़ रहे हैं। उसके बाद हवा में तैरता हुआ ‘झूठा क्लीयरेंस’ आया। अवसरवादी अर्जेंटीनी स्ट्राइकर ने झपट्टा मारा। इंग्लैंड के गोलकीपर ने भी छलांग लगायी. लेकिन गेंद अंग्रेजों के जाल में फंस गयी.

1986 विश्व कप के उस मैच के बाद से, एक सवाल आज तक उस गोल को परेशान करता है – क्या गेंद माराडोना के हाथ में थी? बाद में सुपरस्टार ने कहा, ”इस लक्ष्य के पीछे ”भगवान का हाथ” है. वह खुद को भगवान कहना चाहता था?

फिल्म ‘आर्टिकल 370’ देखकर मुझे वह लक्ष्य याद आ गया। फिल्म में सरकार की हरकत को इतने सटीक तरीके से दिखाया गया है, ऐसा लगता है जैसे माराडोना अपने साथियों के साथ प्रतिद्वंद्वी के गोल की ओर एक के बाद एक पास दे रहे हैं। विरोधी कौन हैं? जम्मू-कश्मीर में उस समय के राजनीतिक दल, जिनके निहित स्वार्थ दृश्य-दर-दृश्य उजागर होते रहे हैं? या पाकिस्तान, जिसने पिछले 75 वर्षों में कश्मीर पर कई युद्ध लड़े हैं? या, जवाहरलाल नेहरू और उनकी पार्टी कांग्रेस? इस फिल्म की पटकथा बिना छुपे जिन लोगों को सौंपी गई है। असली मज़ा तो उस पटकथा में है। आदित्य दहर द्वारा निर्मित और आदित्य सुहास जंबाल द्वारा निर्देशित आर्टिकल 370 उनकी पटकथा के लिए नंबर पाने वाली पहली फिल्म होगी। अर्जुन धवन ने दो आदित्यों के साथ मिलकर पटकथा लिखी है। पटकथा लेखकों ने 2 घंटे 40 मिनट की फिल्म को पांच ‘अध्यायों’ में विभाजित किया है। शोध की छाप साफ है. वह सभी शोध तथ्यात्मक नहीं हैं। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यावहारिक तौर पर दर्शकों से इस फिल्म से इतिहास जानने को कहा है. हालाँकि, ‘कश्मीर फाइल्स’ जैसी कुछ पिछली फिल्मों के अनुभव से निर्माता-निर्देशक ने ‘आर्टिकल 370’ की शुरुआत में ही बता दिया था कि फिल्म में एक कहानी है। मेरा मतलब है कि फिल्म ऐतिहासिक जानकारी नहीं दे रही है. यहां भी अपवाद स्वरूप यह वैधानिक चेतावनी काफी समय से दिखाई जा रही है।

उसके बाद की कहानी. इसमें अभिनय, छायांकन, चरित्र-चित्रण और कुछ महत्वपूर्ण क्षणों का दृश्यांकन शामिल है। इसके कुछ वास्तविक दृश्य उपयोग भी हैं। शुरुआत में अजय देवगन की आवाज ने देखते ही देखते इतिहास रच दिया. हाल ही में, ‘प्रचार फिल्में’ या ‘प्रचार फिल्में’ के नाम से मशहूर फिल्मों में इतिहास की झलक दिखाने की ‘प्रथा’ जगजाहिर है। इतिहास के सबसे आम तर्क और प्रतितर्क यहां प्रस्तुत नहीं किए गए हैं। कोई क्या विश्वास करता है या क्या उपदेश देना चाहता है, यह घटनाओं की उसकी व्याख्या से पता चलता है। अनुच्छेद 370 अलग नहीं है.

लेकिन बनावट के मामले में फिल्म असाधारण है. यहां साढ़े चार साल की घटनाओं को दिखाया गया है. कहानी काफी दिलचस्प है. अभिनय? मुख्य किरदार जूनी हक्सर के रूप में यामी गौतम, केंद्र सरकार के सचिवों में से एक राजेश्वरी स्वामीनाथन के रूप में प्रियामणि, वैभव सिद्धांतकार के रूप में यश चौहान या पत्रकार बृंदा ने फिल्म की एंकरिंग की है। यामी गौतम ने अपने पति आदित्य दहर के प्रोडक्शन में शायद अपने जीवन की सबसे चुनौतीपूर्ण भूमिका निभाई और पूरे अंक बटोरे।
लेकिन असली आश्चर्य राजनीतिक नेताओं के चित्रण में है। यहां भी आदित्यों की स्तुति होगी। प्रधान मंत्री के रूप में अरुण गोबिल, गृह मंत्री के रूप में किरण कर्माकर और कास्टिंग और प्रोस्थेटिक्स उत्कृष्ट हैं। दिव्या शेठ शाह को महबूबा मुफ्ती की याद आना लाजमी है. अरुण गोबिल को टेलीविजन धारावाहिक राम सेज से प्रसिद्धि मिली। उन्हें नरेंद्र मोदी के सामने आते देख अवचेतन में कहीं न कहीं एक सीधी रेखा बनती है. यह सब अच्छा है… नहीं, फिल्म में एक बाधा बनी हुई दिखती है। संविधान से अनुच्छेद 370 को हटाने और उसे जड़ से उखाड़ फेंकने की प्रक्रिया के पीछे की कहानी इस फिल्म की जान है। वे सभी घटनाएँ एक बड़ी सीधी रेखा में आगे बढ़नी चाहिए। और पटकथा कितनी आसानी से पिछले सभी सिद्धांतों को खारिज कर देती है!

दूसरी बाधा सत्य के दूसरे पक्ष से बचना है। इस फिल्म में कहीं भी ऐसा नहीं कहा गया है कि लद्दाख के लोगों का गुस्सा फूटने वाला है. भले ही पुलवामा घटना को दिखाया जा चुका है, लेकिन इससे जुड़े हजारों मुश्किल सवाल हैं, जिनका जवाब देने से सरकार अभी भी बच रही है. यह फिल्म केवल सरकार की सफलता का आख्यान है। बिल्कुल हॉलीवुड की ‘प्रचार फिल्म’ की तरह, जिसमें लादेन को एक समय क्रांतिकारी के रूप में भी दिखाया गया था!

हालाँकि, ‘अनुच्छेद 370’ ‘कश्मीर फ़ाइलें’ नहीं है। यहां उस राज्य के अम-मुसलमानों को उत्पीड़ित के रूप में चित्रित किया जाता है, पाकिस्तान को खलनायक बनाया जाता है। तो अंतिम दृश्य में बादल रहित डल झील का क्लोज़-अप लंबा शॉट आनंददायक है।

तापसी पन्नू अपने बॉयफ्रेंड बैडमिंटन प्लेयर मैथिस बो से मार्च में शादी कर रही हैं.

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बॉलीवुड में अब सिर्फ अच्छी खबर है. कुछ सितारे माता-पिता बन रहे हैं तो कुछ नया परिवार शुरू कर रहे हैं। एक्ट्रेस रकुल प्रीत सिंह और प्रोड्यूसर जैकी भगनानी ने फरवरी में शादी की थी। इस बार एक और स्टार की शादी. तापसी पन्नू करीब 10 साल तक एक बैडमिंटन प्लेयर के साथ रिलेशनशिप में हैं। उनका रिश्ता एक और कदम उठाने जा रहा है। तापसी और भारतीय बैडमिंटन टीम के डबल्स कोच माथियास बोवे शादी कर रहे हैं। दूल्हा विदेशी है तो दुल्हन पंजाबी है. यदि हां, तो किन नियमों के तहत शादी होगी? तापसी जानबूझकर नहीं चाहतीं कि उनके काम के अलावा उनकी निजी जिंदगी पर ज्यादा चर्चा हो। इतने सालों के प्रेम संबंध के बाद भी उन्होंने कभी अपनी प्रेमिका को इस तरह सबके सामने नहीं लाया। एक्ट्रेस ने इस साल पहली बार रिश्ते पर मुहर लगाई। कुछ ही महीनों में उनकी शादी की खबरें. एक बॉलीवुड स्टार की शादी का मतलब पहले से ही भव्य इंतजाम, भव्यता और करोड़ों रुपये होता है। लेकिन तापसी हमेशा से ही बीते जमाने के बॉलीवुड स्टार्स से थोड़ी अलग रही हैं। इस मामले में भी वह दूसरे रास्ते पर चलेंगे. शादी को लेकर उनका किसी से कोई कॉम्पिटिशन नहीं है। वह अपनी तुलना दूसरों से नहीं करते, चाहे वह पेशेवर जीवन हो या निजी जीवन। तापसी कहती हैं, अगर आप शादी भी कर लें तो भी आपको कोई धूमधाम नहीं चाहिए। तापसी ने साफ किया कि मैथियास के साथ उनका रिश्ता बाकी स्टार जोड़ियों से काफी अलग है। इसलिए उनकी शादी में ज्यादा रौनक नहीं होगी. वे अपनी शर्तों पर, अपने तरीके से शादी करेंगे। वे घरेलू स्तर पर शादी तय करना चाहते हैं। हालांकि उनकी शादी ‘फ्यूजन वेडिंग’ होगी। दूल्हे की इच्छा के मुताबिक शादी समारोह ईसाई रीति-रिवाज के साथ-साथ पंजाबी रीति-रिवाज से भी किया जाएगा. शादी समारोह मार्च में उदयपुर में होगा।

दर्शकों ने हाल ही में तापसी पन्नू को फिल्म ‘डंकी’ में देखा था। इस फिल्म में उन्होंने शाहरुख खान के साथ जोड़ी बनाई थी. हीरोइन के अभिनय को भी खूब सराहा गया है. हालांकि, एक्ट्रेस ने अब तक कभी भी अपनी पर्सनल लाइफ पर चर्चा नहीं की है. लेकिन हाल ही में एक्ट्रेस ने अपने लंबे समय के प्रेम संबंध के बारे में खुलासा किया। तापसी 10 साल से एक बैडमिंटन प्लेयर के साथ रिलेशनशिप में हैं। हीरोइन ने पहली बार प्यार के बारे में बात की.

तापसी ने कहा, “मैं पिछले 10 साल से एक आदमी के साथ रिलेशनशिप में हूं। मैंने 13 साल पहले एक्टिंग शुरू की थी।” मैंने अपनी पहली हिंदी फिल्म उसी साल बनाई जब मैथियास बोअर ने मुझसे संपर्क किया। तब से मैं केवल एक ही व्यक्ति के साथ रिश्ते में हूं। मुझे उससे अलग होने की कोई इच्छा नहीं है. मैं उससे बहुत खुश हूं।”

तापसी स्पोर्ट्स से भी जुड़ी हुई हैं। हाल ही में भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली ने राज की आत्मकथात्मक फिल्म ‘सबाश मिठू’ में अभिनय किया। इसके अलावा उन्होंने ‘रश्मि रॉकेट’ और ‘सार की आंख’ जैसी राष्ट्रीय खेल फिल्मों में अभिनय किया है। अभिनेत्री तापसी पन्नूर को अपनी निजी जिंदगी के बारे में ज्यादा प्रचार पसंद नहीं है। लेकिन हाल ही में उन्होंने इंस्टाग्राम पर फैन्स के सवालों के जवाब दिए. काम से लेकर निजी जिंदगी तक – कई चीजें सामने आती हैं। तापसी ने सभी सवालों के जवाब दिए.

एक फैन ने उनसे पूछा कि आप शादी कब कर रहे हैं? जवाब में एक पल की भी देरी किए बिना तापसी ने कहा, ‘मैं प्रेग्नेंट नहीं हूं।’ साथ ही उन्होंने कहा, ”मैं अभी शादी नहीं कर रहा हूं. जब मुझे पता चलेगा तो मैं आप सभी को बता दूंगी।” नेहा धूपिया से लेकर आलिया भट्ट तक – इस दौर की कई बॉलीवुड अभिनेत्रियों ने गर्भवती होने के बाद शादी करने का फैसला किया है। तब तापसी ने इस जवाब से अपने साथियों पर जड़ा मुक्का! तापसी पिछले नौ साल से बैडमिंटन प्लेयर माथियास बोवे के साथ रिलेशनशिप में हैं। एक्ट्रेस ने खुद कहा था कि उन्हें शादी की कोई जल्दी नहीं है। एक इंटरव्यू में तापसी ने कहा कि जब आप बच्चे के बारे में सोचेंगे तो शादी के बारे में सोचेंगे। लेकिन फिलहाल इसकी कोई संभावना नहीं है. कुछ दिनों पहले तापसी अपने बॉयफ्रेंड के साथ लंबी छुट्टियों पर गई थीं। इस बार वह माथियास के साथ क्राबी जाने की योजना बना रहा है।

तापसी ने मैथियास के साथ अपने रिश्ते के बारे में पहले ही बता दिया था. कहा, ”हमेशा से बॉलीवुड इंडस्ट्री के बाहर किसी के साथ रिश्ता रखना चाहती थी। अपने करियर की शुरुआत में मेरी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से हुई जिसके साथ मैं बहुत सहज महसूस करती थी।”

तापसी स्पोर्ट्स से जुड़ी हुई हैं। हाल ही में भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली ने राज की आत्मकथात्मक फिल्म ‘सबाश मिठू’ में अभिनय किया। इसके अलावा उन्होंने ‘रश्मि रॉकेट’ और ‘सार की आंख’ जैसी राष्ट्रीय खेल से जुड़ी फिल्मों में काम किया।