Friday, March 6, 2026
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आखिर कहां से आया था नोटा बटन का आईडिया?

आज हम आपको बताएंगे कि आखिर नोटा बटन का आईडिया कहां से आया था! लोकसभा चुनाव 2024 के पहले फेज के लिए वोटिंग शुरू हो चुकी है। सोशल मीडिया पर मतदान के साथ ही NOTA (इसमें से कोई नहीं) भी ट्रेंड में है। कुछ सोशल मीडिया यूजर्स यह भी कह रहे हैं कि जब से नोटा का ऑप्शन मिला है तब से भाजपा जीत रही है। कहीं विरोध के रूप में नोटा का इस्तेमाल भाजपा को फायदा तो नहीं पहुंचा रहा है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के आंकड़ों के अनुसार, 2019 के लोकसभा चुनाव में 1.06 फीसदी वोट नोटा के पक्ष में पड़े थे। वहीं 2018 में छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों के दौरान सबसे ज्यादा 1.98 फीसदी वोट नोटा के पक्ष में पड़े थे। 2019 में लक्षद्वीप में नोटा के तहत सबसे कम यानी 100 वोट डाले गए थे। वहीं, राज्यों में सबसे कम नोटा का प्रतिशत दिल्ली और मिजोरम में रहा। दोनों राज्यों में नोटा के लिए 0.46 प्रतिशत वोट डाले गए। हालांकि, बीते 5 साल लोकसभा और विधानसभा चुनावों में नोटा के तहत 1.29 करोड़ वोट पड़े। कुछ एक्सपर्ट तो इसे बिना दांत और नाखून के बाघ भी बता रहे हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर डॉ. राजीव रंजन गिरि ने नोटा को ज्यादा प्रभावी नहीं बताया। उन्होंने कहा कि बेहतर तो ये होता कि जिन प्रत्याशियों को वोटर नकार रहे हैं, उन्हें अगले चुनाव में लड़ने से रोका जाना चाहिए। वह कहते हैं कि नोटा का इस्तेमाल इतना मामूली है कि इससे किसी प्रत्याशी के जीत-हार का फैसला नहीं हो सकता है। इतना जरूर है कि जहां कांटे की टक्कर है, वहां पर यह निर्णायक हो सकता है। वहीं, हाल ही में ADR के हेड मेजर जनरल रि. अनिल वर्मा ने एक एजेंसी से बातचीत में कहा था कि नोटा एक तरह से बिना दांत के बाघ जैसा है। यह राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ आक्रोश या असहमति जताने का एक प्लेटफॉर्म भर है।

सुप्रीम कोर्ट के सितंबर, 2013 में आए एक फैसले के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में नोटा का का इस्तेमाल शुरू किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को यह निर्देश दिया था कि वह बैलट पेपर्स या ईवीएम में नोटा का प्रावधान करे ताकि वोटर्स को किसी को भी वोट नहीं करने का हक मिल सके। इसके बाद आयोग ने ईवीएम में नोटा का बटन आखिरी विकल्प के रूप में रखा। दरअसल, रूल 49-O के नियम के अनुसार, किसी वोटर को यह हक है कि वह वोट नहीं करे। नोटा से पहले कोई वोटर अगर किसी प्रत्याशी को वोट नहीं देना चाहता था तो उसे फॉर्म 490 भरना पड़ता था। हालांकि, पोलिंग स्टेशन पर ऐसे फॉर्म भरना उस वोटर के लिए खतरा भी हो सकता था। यह कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स, 1961 का उल्लंघन भी था। इससे वोटर की गोपनीयता से समझौता करना पड़ता था।

एडीआर की एक रिपोर्ट के अनुसार, बीते एक दशक में दागदार प्रत्याशियों की संख्या में इजाफा हुआ है। 2009 में लोकसभा चुनाव जीतने वाले कुल 543 उम्मीदवारों में से 162 यानी 30 फीसदी ऐसे थे, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले थे। वहीं, 76 यानी 14 फीसदी प्रत्याशी ऐसे थे, जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले चल रहे थे। 2019 में लोकसभा पहुंचने वाले ऐसे प्रत्याशी 43 फीसदी हो चुके थे, जबकि गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे करीब 29 फीसदी प्रत्याशी लोकसभा पहुंचे थे। नोटा का विचार सबसे पहले अमेरिका के एक नगर निगम से आया था। दरअसल, 1976 में कैलिफोर्निया की सैंटा बारबरा काउंटी में ऑफिशियल इलेक्टोरल बैलट में वहां की म्यूनिसिपल इन्फॉर्मेशन काउंटी ने नोटा के इस्तेमाल का प्रस्ताव पारित किया था। हमारे देश में 2009 में भारत कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट में यह अपील की थी कि नोटा का इस्तेमाल बैलट में करने के लिए सुनिश्चित किया जाए। इससे वोटर को यह आजादी मिलेगी कि वह किसी अयोग्य उम्मीदवार को न चुने। द पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ने इस बारे में बाकायदा एक जनहित याचिका दायर की। पहली बार नोटा का इस्तेमाल 2013 में चार राज्यों छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में किया गया था।

नोटा का विकल्प अर्जेंटीना, बेलारूस, बेल्जियम और बुल्गारिया में आई डॉन्ट सपोर्ट एनीवन के रूप में मौजूद है। कनाडा, कोलंबिया, फ्रांस, ग्रीस में ब्लैंक वोट तो भारत-अमेरिका में नन ऑफ द अबव के रूप में यह विकल्प है। इंडोनेशिया में एंपटी बॉक्स तो कजाखिस्तान, स्विट्जरलैंड और उरुग्वे में नन ऑफ दीज कैंडिडेट्स कहा जाता है। रूस में नोटा में अगेंस्ट ऑल के रूप में यह मौजूद है।

जब पहली बार भारत से विदेश डिलीवर हुई ब्रह्मोस मिसाइल!

हाल ही में भारत से विदेश ब्रह्मोस मिसाइल डिलीवर हो चुकी है! कभी राफेल फाइटर जेट तो कभी एस-400 मिसाइल सिस्टम के भारत आने की तस्वीरें तो आपने जरूर देखी होंगी। ये पहली बार है जब भारत ने किसी दूसरे देश को सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस सौंपी है। दोनों देशों ने 2022 में 375 मिलियन अमेरिकी डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसी डील के तहत भारत ने फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें दी है। शुक्रवार को भारतीय वायु सेना का सी-17 ग्‍लोबमास्‍टर ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट मिसाइल सिस्टम लेकर फिलिपींस के कलार्क एयर बेस पहुंचा। इस दौरान ब्रह्मोस मिसाइल की डिलिवरी के फोटो आपका दिल जीत लेंगे। रक्षा जानकारों का कहना है कि फिलिपींस के साथ हुई यह डिफेंस डील भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए पहला प्रमुख इंटरनेशनल एक्सपोर्ट ऑर्डर था। यह ऑर्डर 290 किमी की रेंज वाली एक एंटी-शिप क्रूज मिसाइल के तट-आधारित संस्करण के लिए है। दोनों देशों के बीच साल 2022 में इसे लेकर डील हुई थी। भारत और फिलीपींस के बीच लगभग 37.5 करोड़ अमेरिकी डॉलर पर डील को लेकर सहमति हुई थी।

भारत की ओर से फिलीपींस को यह मिसाइल प्रणाली की डिलीवरी उस वक्त दी गई है, जब दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस और चीन के बीच लगातार तनाव बना हुआ है। भारत ने शुक्रवार को फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों का पहला सेट सौंपा है। इस दौरान फिलीपींस मरीन कॉर्प्स के अफसरों को भारतीय अधिकारियों ने मिठाई भी खिलाई। फिलीपींस मरीन कॉर्प्स को यह मिसाइल सिस्टम पहुंचाने के लिए भारतीय वायु सेना के सी-17 ग्लोबमास्टर ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट की मदद ली गई। सी-17 ग्लोबमास्टर शुक्रवार को फिलीपींस पहुंचे हैं। ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के साथ-साथ इस प्रणाली के लिए ग्राउंड सिस्टम का निर्यात बीते महीने से ही शुरू हो गया था। माना जा रहा है कि ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली को फिलीपींस की ओर से अपने तटीय इलाकों में तैनात किया जा सकता है। ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल भारत और रूस के बीच एक संयुक्त तौर पर बनाया गया है। भारत में डीआरडीओ और रूस के एनपीओ मशिनोस्ट्रोयेनिया इसके प्रमुख साझेदार हैं।

ब्रह्मोस मिसाइल को पूरे विश्व भर में सबसे सटीक और सफल मिसाइल प्रोग्राम में से एक माना जाता है। डिफेंस एक्सपर्ट बताते हैं कि वैश्विक स्तर पर सबसे अग्रणी और सबसे तेज सटीक-निर्देशित हथियार के रूप में ब्रह्मोस ने भारत की निवारक क्षमताओं को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारतीय सेना ने 2007 से कई ब्रह्मोस रेजिमेंटों को अपने शस्त्रागार में एकीकृत किया है। पूर्व एयर चीफ मार्शल आर. के. एस. भदौरिया ने ब्रह्मोस मिसाइल के फिलिपींस को एक्सपोर्ट किए जाने पर जमकर तारीफ की है।ग्‍लोबमास्‍टर ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट मिसाइल सिस्टम लेकर फिलिपींस के कलार्क एयर बेस पहुंचा। इस दौरान ब्रह्मोस मिसाइल की डिलिवरी के फोटो आपका दिल जीत लेंगे। रक्षा जानकारों का कहना है कि फिलिपींस के साथ हुई यह डिफेंस डील भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए पहला प्रमुख इंटरनेशनल एक्सपोर्ट ऑर्डर था। यह ऑर्डर 290 किमी की रेंज वाली एक एंटी-शिप क्रूज मिसाइल के तट-आधारित संस्करण के लिए है। उन्होंने एक्स पर पोस्ट में लिखा- ये भारत के लिए गर्व का पल है। IAF_MCC सी-17 ने फिलीपींस को निर्यात की गई पहली भारत में निर्मित ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की आपूर्ति की। भारतीय उद्योग के लिए ये बड़ा मील का पत्थर है। यह तो डिफेंस एक्सपोर्ट में भारतीय कहानी की शुरुआत है।

रक्षा विशेषज्ञों ने मिसाइल प्रणाली के विषय में जानकारी देते हुए बताया कि एक मिसाइल प्रणाली कई सब-सिस्टम से बनी होती है। इसमें लॉन्चर, वाहन, लोडर, कमांड और नियंत्रण केंद्र शामिल हैं। भारत के पास लंबी दूरी की कई मिसाइलें हैं।ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के साथ-साथ इस प्रणाली के लिए ग्राउंड सिस्टम का निर्यात बीते महीने से ही शुरू हो गया था। माना जा रहा है कि ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली को फिलीपींस की ओर से अपने तटीय इलाकों में तैनात किया जा सकता है। ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल भारत और रूस के बीच एक संयुक्त तौर पर बनाया गया है। भारतीय उद्योग के लिए ये बड़ा मील का पत्थर है। यह तो डिफेंस एक्सपोर्ट में भारतीय कहानी की शुरुआत है।भारत में डीआरडीओ और रूस के एनपीओ मशिनोस्ट्रोयेनिया इसके प्रमुख साझेदार हैं। वहीं, फिलीपींस को जो मिसाइलें दी जा रही हैं, वह मूल रूप से छोटे संस्करण की हैं। इसके साथ ही सूत्रों ने यह भी स्पष्ट किया कि एक्सपोर्ट की जा रही मिसाइलें बिल्कुल नई हैं और वे उस खेप का हिस्सा नहीं हैं, जो भारतीय सशस्त्र बलों के लिए हैं।

आखिर दुबई में कैसे आई तूफानी बाढ़?

हाल ही में दुबई में तूफानी बाढ़ देखने को मिली! दुबई समेत UAE के कई इलाकों में इस हफ्ते हुई भारी बारिश से आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। कई जगह बाढ़ जैसे हालात हो गए। व्यस्त दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भी जलमग्न हो गया, जिसके कारण कई फ्लाइट्स रद्द करनी पड़ीं। अचानक बारिश और उसके बाद आई बाढ़ के हालात से उबरने की कोशिश यहां के लोग कर रहे हैं। जिस तरह से संयुक्त अरब अमीरात के कई इलाकों में जोरदार बारिश हुई उसे लेकर लोगों ने आश्चर्य जताया। उन्होंने आशंका जताई कि क्या यह क्लाउड सीडिंग (बारिश कराने के लिए मौसम परिवर्तन की तकनीक को क्लाउड सीडिंग कहते हैं) थी। जिसके कारण दुबई में बाढ़ आई। ऐसे प्रोजेक्ट में शामिल भारतीय वैज्ञानिकों ने स्पष्ट रूप से यूएई में हुई बारिश के क्लाउड सीडिंग से किसी भी संबंध को खारिज किया है। मौसम वैज्ञानिकों और जलवायु विज्ञानियों ने इस रिकॉर्ड वर्षा के लिए जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराया है। ऐसा माना जाता है कि सूखे से जूझ रहा यूएई अपने घटते भूजल स्तर को बढ़ाने के लिए समय-समय पर क्लाउड सीडिंग करता है, इसलिए सोमवार रात और मंगलवार शाम के बीच हुई अत्यधिक बारिश ने क्लाउड सीडिंग प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए। देश में 24 घंटे से भी कम समय में रिकॉर्ड 255 मिमी बारिश हुई, जिससे दुबई में बाढ़ आ गई। वहीं पड़ोसी देशों कतर, ओमान, बहरीन और सऊदी अरब में भी भारी बारिश हुई, लेकिन संयुक्त अरब अमीरात के दुबई में इसका सबसे अधिक असर पड़ा।

भारत में क्लाउड सीडिंग प्रोजेक्ट से जुड़े आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर सच्चिदानंद त्रिपाठी ने कहा कि क्लाउड सीडिंग और दुबई में आई बाढ़ के बीच कोई संबंध नहीं है। सच्चिदानंद त्रिपाठी ने हमारे सहयोगी अखबार टीओआई से बात करते हुए कहा कि तूफान के विकास के शुरुआती फेज में सीडिंग की कोशिश की जाती है। इस मामले में जब सिस्टम ओमान की खाड़ी से आगे बढ़ा तो यह पहले से ही एक तेज तूफान था। ऐसे सिस्टम को सीड करना बेहद असंभव और असुरक्षित है। सीडिंग से अधिकतम 25 फीसदी बारिश में वृद्धि हो सकती है। इस मामले में कुल बारिश 25 सेमी थी, इसलिए बिना सीडिंग के भी 20 सेमी बारिश हुई होगी।

जाने-माने जलवायु वैज्ञानिक और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के पूर्व सचिव माधवन राजीवन ने भी ऐसे किसी भी संबंध की संभावना को खारिज किया। उन्होंने कहा कि क्लाउड सीडिंग से इतनी भारी बारिश और बाढ़ नहीं आ सकती। संभावित कारणों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि यह जलवायु परिवर्तन का बिल्कुल स्पष्ट संकेत है। ये भारी तूफान था जो खाड़ी क्षेत्र में एक्टिव एक सिनॉप्टिक सिस्टम के कारण आया। ग्लोबल वार्मिंग के साथ यह प्रवृत्ति है कि अगर बारिश होती है, तो बहुत भारी बारिश होती है। हमें दुनिया के किसी भी हिस्से में और किसी भी समय इस तरह की घटनाओं के बारे में जानकारी की उम्मीद रखनी चाहिए।

भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के पूर्व प्रमुख केजे रमेश का भी मानना है कि बादल छाए रहना भारी बारिश का मुख्य कारण नहीं है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी विक्षोभ के कारण होने वाली अत्यधिक बारिश की घटनाएं इस क्षेत्र में बाढ़ का मुख्य कारण हैं। जलवायु परिवर्तन के साथ इसके संबंध पर उन्होंने कहा कि यह सभी लोग जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन ग्लोबल वार्मिंग के तहत कोई भी बारिश कराने वाला सिस्टम अधिक मजबूत होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि जलवायु परिवर्तन की वजह से वायुमंडल में बादल अतिरिक्त नमी धारण कर लेते हैं और भारी होते जाते हैं। इसी से बारिश कराने वाले सिस्टम की तीव्रता बढ़ जाती है। मौसम की घटनाओं के बारे में विस्तार से बताते हुए केजे रमेश ने कहा कि अरब सागर से अतिरिक्त नमी के कारण पश्चिमी लहरों का दक्षिण की ओर विस्तार हुआ। इसी के चलते मौसम में बदलाव हुआ। इसी वजह से न केवल संयुक्त अरब अमीरात बल्कि ओमान, उत्तरी सऊदी अरब, बहरीन, कतर में भी भारी बारिश हुई। इससे पहले, इसी प्रकार के वेस्टर्न डिस्टर्बेंस की वजह से अफगानिस्तान में दो दिनों तक भारी वर्षा हुई थी। जिसके चलते पाकिस्तान में बाढ़, तूफान और बिजली गिरने की घटनाएं हुईं थीं।

यूएई के क्लाउड सीडिंग प्रोजेक्ट के बारे में रमेश ने बताया कि इस देश ने 2002 में अपने बारिश बढ़ाने वाले प्रयोग शुरू किए थे। इसमें वो आस-पास के क्षेत्रों में बारिश करने वाली मौसम प्रणाली विकसित होने पर विमान आधारित क्लाउड सीडिंग करने की कोशिश की। ऐसे प्रयासों के माध्यम से, क्लाउड सीडिंग टीम बारिश को प्राकृतिक रूप से होने वाली बरसात से 15 फीसदी अधिक बढ़ाने में सक्षम थे।

आखिर लोकसभा चुनाव के पहले चरण में क्या-क्या हुआ?

आज हम आपको बताएंगे कि लोकसभा चुनाव के पहले चरण में क्या-क्या हुआ है! दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनावी महाकुंभ का विधिवत शंखनाद हो गया है। लोकसभा चुनाव 2024 के पहले फेज में शुक्रवार को 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की 102 सीटों पर जमकर वोटिंग हुई। चुनाव आयोग के मुताबिक, देशभर में रात 9 बजे तक 62.37 फीसदी मतदान हुआ। इस दौरान मणिपुर में भारी हिंसा की सूचना मिली है। पश्चिम बंगाल में भी हिंसा की कुछ छिटपुट घटनाएं सामने आईं। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में एक पोलिंग बूथ पर लाठी-डंडे चले। कांग्रेस-बीजेपी कार्यकर्ताओं में झड़प हुई। इसमें कुछ लोग घायल भी हुए। हालांकि, जल्द पुलिस प्रशासन ने स्थिति को संभाला। वहीं छत्तीसगढ़ में एक ग्रेनेड लॉन्चर के गोले में दुर्घटनावश ब्लास्ट होने से सीआरपीएफ के एक जवान की मौत हो गई। चुनाव के दौरान कुछ और जगहों से भी छुटपुट घटनाओं की सूचना आई। फिलहाल पहले दौर की वोटिंग संपन्न हो चुकी है। ECI की ओर से रात 9 बजे तक जारी आंकड़ों में 62.37 फीसदी मतदान हुआ। ये साल 2019 लोकसभा चुनाव के आंकड़ों से कुछ कम ही रहा। लोकसभा चुनाव में पहले फेज के लिए मतदान सुबह सात बजे आरंभ हुआ और शाम छह बजे तक चला। चुनाव आयोग के मुताबिक, शाम 7 बजे तक 60.03 फीसदी वोटिंग हुई। जिन बूथ पर 6 बजे के बाद भी वोटर्स की लाइन लगी थी वहां तय वक्त से आगे भी वोटिंग को जारी रही। इससे संभावना जताई जा रही कि वोटिंग पर्सेंट में आगे कुछ बदलाव आ सकता है। वहीं अलग-अलग राज्यों में शुक्रवार शाम 6 बजे तक के वोटिंग पर्सेंट देखें तो पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा वोटिंग दर्ज की गई। यहां 77.57 फीसदी मतदान हुआ। दूसरे नंबर त्रिपुरा रहा, जहां 76.10 फीसदी वोटिंग हुई। मेघालय में 69.91 फीसदी, मध्य प्रदेश में 63.25, तमिलनाडु में 62.08, यूपी में 57.54 फीसदी, बिहार में 46.32 फीसदी मतदान हुआ। महाराष्ट्र में 54.85, उत्तराखंड में 53.56, जम्मू-कश्मीर में 65.08, राजस्थान में 50.27, छत्तीसगढ़ में 63.41, असम में 70.77 फीसदी वोटिंग हुई। अरुणाचल में 64.07, नगालैंड 56.18, मिजोरम में 53.96, सिक्किम 68.06 फीसदी, मणिपुर 68.62 फीसदी, अंडमान निकोबार में 56.87, लक्षद्वीप में 59.02, पुडुचेरी में 72.84 फीसदी मतदान हुआ।

2024 के चुनावी रण में पहले फेज की वोटिंग के दौरान युवा मतदाताओं में खासा उत्साह देखने को मिला। मतदान केंद्रों पर पहली बार मतदान करने वालों में विवाह परिधान में आए कई नवविवाहित जोड़े नजर आए। वहीं दिव्यांग लोग और स्ट्रेचर, व्हीलचेयर पर आए कुछ बुजुर्ग शामिल अपने मताधिकार के इस्तेमाल को लेकर एक्टिव नजर आए। पहले चरण में 102 सीटों पर मतदान हुआ। इसके साथ ही 8 केंद्रीय मंत्रियों, विपक्ष के कई बड़े नेताओं की किस्मत का फैसला वोटिंग मशीन में कैद हो गया। इन 102 सीटों पर कुल 1,625 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे।

चुनाव के दौरान कुछ जगहों पर हिंसा की शिकायतें आईं। सबसे ज्यादा हिंसा की सूचना मणिपुर से आई। इनर मणिपुर लोकसभा सीट के तहत आने वाले थोंगजु विधानसभा क्षेत्र में स्थानीयों और अज्ञात लोगों के बीच झड़प की खबरें आईं। मणिपुर में कुछ जगहों पर ईवीएम को नुकसान पहुंचाए जाने की भी खबरें आईं। उधर पूर्वी नगालैंड के छह जिलों में सन्नाटा पसरा रहा। यहां अलग राज्य की मांग को लेकर आदिवासी संगठनों के एक संघ ने अनिश्चितकालीन बंद का आह्वान किया। इसके कारण लोग घरों में ही रहे।

नगालैंड के छह पूर्वी जिलों में मतदान कर्मी वोटिंग सेंटर्स पर नौ घंटे तक इंतजार करते रहे, लेकिन कोई वोटर नहीं आया। ‘फ्रंटियर नगालैंड टेरिटरी’ (एफएनटी) की मांग को लेकर दबाव बनाने के लिए एक संगठन की ओर से बुलाए गए बंद के बाद क्षेत्र के चार लाख मतदाताओं में से कोई भी वोटिंग करने नहीं आया। मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने शुक्रवार को इसकी पुष्टि की कि राज्य सरकार को ईस्टर्न नगालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (ईएनपीओ) की एफएनटी की मांग से कोई दिक्कत नहीं है। वह पहले ही इस क्षेत्र के लिए स्वायत्त शक्तियों की सिफारिश कर चुकी है। ईएनपीओ पूर्वी क्षेत्र के सात जनजातीय संगठनों की शीर्ष संस्था है। अधिकारियों ने बताया कि जिला प्रशासन और अन्य आपातकालीन सेवाओं से जुड़े लोगों और गाड़ियों को छोड़कर सड़कों पर किसी भी व्यक्ति या वाहन की कोई आवाजाही नहीं दिखी। नगालैंड के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी आवा लोरिंग ने बताया कि 20 विधानसभा क्षेत्रों वाले इस क्षेत्र के 738 मतदान केंद्रों पर मतदान कर्मी सुबह सात बजे से शाम चार बजे तक मौजूद रहे। सीईओ कार्यालय के सूत्रों ने बताया कि इन नौ घंटों में कोई भी वोट डालने नहीं आया। बीस विधायकों ने भी अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं किया। नगालैंड के 13.25 लाख मतदाताओं में से पूर्वी नगालैंड के छह जिलों में 4,00,632 मतदाता हैं।

लोकसभा चुनाव के पहले चरण में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आठ सीटों पर वोटिंग हुई। इस दौरान रामपुर में सपा प्रत्याशी मोहिबुल्लाह नदवी की पुलिस से तीखी नोकझोंक हो गई। वहीं, मुरादाबाद के सपा सांसद एसटी हसन ने पुलिस पर अभद्रता का आरोप लगाया है। रामपुर से सपा उम्मीदवार मोहिबुल्लाह नदवी ने पुलिस-प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि खास वर्ग के मतदाताओं को पुलिस परेशान कर रही है। पूरे जिले से शिकायतें आई है। उनका यह वीडियो वायरल हो रहा है। मुरादाबाद से सपा सांसद डॉक्टर एसटी हसन ने एक सब इंस्पेक्टर पर बड़ा आरोप लगाया है। उनका कहना है कि दरोगा ने ऑफिस में घुसकर उनके और स्टाफ से बदसलूकी की। एसटी हसन ने कहा कि मामले की शिकायत चुनाव आयोग और पुलिस-प्रशासन से की जाएगी।

आखिर क्या है महाराष्ट्र की बारामती सीट की कहानी?

आज हम आपको महाराष्ट्र की बारामती सीट की कहानी बताने जा रहे हैं! बारामती में इस बार अभूतपूर्व मुकाबला है। NCP के दो धड़ों की यह निर्णायक लड़ाई है। इसमें अजित हारे तो BJP में उनका कद घट जाएगा और शरद पवार हारे तो उनके राजनीतिक जीवन का पटाक्षेप आरंभ हो जाएगा। अजित की उम्मीदवार उनकी पत्नी सुनेत्रा हैं, जबकि शरद पवार ने बेटी सुप्रिया सुले को उतारा है। इस तरह भौजाई और ननद के बीच यह दंगल है। उनके रूप में असल में भतीजे और चाचा की यह राजनीतिक लड़ाई है। NCP के इन दो धड़ों की तरह शिवसेना के एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे गुट भी टकरा रहे हैं। वहां भी इन दोनों का राजनीतिक भविष्य दांव पर लगा है। BJP इसका लाभ उठाकर अपना ‘मिशन 45’ पूरा करना चाहती है यानी महाराष्ट्र की कुल 48 लोकसभा सीटों में से 45 जीतना! अब बारामती लौटते हैं। दो पवारों की इस लड़ाई में जो भी जीते वह होगा तो आखिर पवार ही! बारामती पिछले 55 वर्षों से पवार परिवार का गढ़ रहा है। शरद पवार 1967 से लेकर 1985 तक, पांच बार बारामती से और 2009 में एक बार सोलापुर जिले के माढ़ा से लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। इसी तरह अजित पवार 1991 में बारामती से लोकसभा पहुंचे थे। यही नहीं, 1991 से 2019 तक, वह सात बार बारामती से विधायक रह चुके हैं।

सुप्रिया पहली बार 2006 में महाराष्ट्र से राज्यसभा पहुंचीं। इसके बाद 2009 से 2019 तक, तीन बार लोकसभा के लिए चुनी गईं। अब वह चौथी बार लोकसभा इलेक्शन लड़ रही हैं। दूसरी ओर, सुनेत्रा कभी राजनीतिक मैदान में नहीं उतरीं। लेकिन, पर्यावरण, ग्रामीण विकास और शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। बारामती हाई-टेक टेक्सटाइल पार्क की अध्यक्ष रह चुकी हैं। इस पार्क से 15 हजार ग्रामीण महिलाएं जुड़ी हैं। शरद पवार द्वारा स्थापित विद्या प्रतिष्ठान की वह उपाध्यक्ष हैं। यह प्रतिष्ठान कई स्कूल-कॉलेज चलाता है, जिनमें कोई 25 हजार छात्र पढ़ते हैं। पर्यावरण पर उनका इनवाइरमेंटल फोरम ऑफ इंडिया है, जो फ्रांस के NGO से भी जुड़ा है।

सुप्रिया इकलौती संतान हैं शरद पवार की। सदानंद सुले से 1991 में उन्होंने शादी की। उनके दो बच्चे हैं – रेवती और विजय। वहीं, सुनेत्रा धाराशिव (पूर्व नाम उस्मानाबाद) के प्रसिद्ध राजनीतिक परिवार से हैं। पद्मसिंह पाटिल की बहन हैं। उनके भतीजे राणा जगजीत सिंह पाटिल अभी BJP से विधायक हैं। सुनेत्रा के दो पुत्रों में से जय बिजनेस संभालते हैं, जबकि पार्थ राजनीति में हैं। पार्थ 2019 में मावल सीट से लोकसभा का चुनाव हार चुके हैं। उधर, सुनेत्रा के मायके वाले BJP में चले गए। अजित पवार की BJP से दोस्ती का धागा शायद यही है। सुप्रिया ने NCP तोड़ने और पवार परिवार में फूट डलवाने के BJP पर जो आरोप लगाए हैं, उसकी पृष्ठभूमि शायद यही है। मतलब यह कि आज बारामती में पवार खानदान में जो लड़ाई दिख रही है, उसके बीज काफी पहले पड़ चुके हैं। इसका अंदाजा ननद सुप्रिया और भौजाई सुनेत्रा, दोनों को था। इसलिए दोनों खेमे काफी पहले से चुनाव की तैयारी कर रहे थे। सुप्रिया गांव-गांव जाकर लोगों से मिलती हैं। सुबह 8 बजे से ही उनके बहुत व्यस्त कार्यक्रम होते हैं, जो देर रात तक चलते हैं। पिता शरद पवार भी पूरे क्षेत्र का लगातार दौरा कर रहे हैं। प्रचार के दौरान ननद-भौजाई एक-दूसरे पर व्यक्तिगत प्रहार कतई नहीं करतीं। ननद तो कहती हैं, ‘वहिणी (भौजाई) मां के समान होती है। यही हमारी संस्कृति है।’ प्रचार की शुरुआत में दोनों की बारामती के हनुमान मंदिर में मुलाकात हुई। दोनों मुस्कुराते हुए एक-दूसरे से मिलीं। शायद यह राजनीतिक मुस्कान हो। वैसे हर चुनाव के पहले पवार परिवार का उम्मीदवार आशीर्वाद लेने इस मंदिर में पहुंचता रहा है।

दोनों प्रचार में विकास के मुद्दे उठाती हैं। सुनेत्रा कहती हैं, ‘लोग जब मिलते हैं तब दादा (अजित) की तारीफ करते हैं। वही हैं, जो विकास को बारामती खींचकर लाए।’ उधर, सुप्रिया पिता शरद पवार और सांसद के रूप में अपने कामों की फेहरिस्त पेश करती हैं। सुप्रिया 55 की हैं तो सुनेत्रा 60 साल की। दोनों ही उच्च शिक्षित। बारामती संसदीय क्षेत्र में छह विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इनमें से दो-दो तीन पार्टियों में बंटे हैं। भोर (संग्राम थोपटे) और पुरंदर (संजय जगताप) कांग्रेस के पास है, इंदापुर (दत्तात्रेय भाले) और बारामती (अजित पवार) NCP के पास, जबकि खड़कवासला (भीमराव तपकीर) और दौंड (राहुल कुल) में BJP के विधायक हैं। गौर करें तो लगता है कि चार विधानसभा क्षेत्रों में अजित पवार खेमा हावी है। कांग्रेस के दो क्षेत्र शरद पवार की ओर झुक सकते हैं। दौंड के विधायक राहुल कुल तो शरद पवार और सुप्रिया के कट्टर विरोधी माने जाते हैं। 2019 में सुप्रिया के खिलाफ उनकी पत्नी कांचन ने चुनाव लड़ा था। सुप्रिया को 53% और कांचन को 41% वोट मिले थे। कांचन, सुनेत्रा के चचेरे भाई विजय सिंह निंबालकर की पुत्री हैं। कांचन का परिवार में विवाह जोड़ने में सुनेत्रा अगुवा थीं। इस वजह से दौंड इलाके में सुनेत्रा का सिक्का चल सकता है।

उधर, एकनाथ शिंदे, देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार ने बागियों को एक-एक कर चुप करा दिया है। यह भी सुनेत्रा के पक्ष में जाएगा। महाराष्ट्र में दो राजनीतिक गठबंधन हैं, महायुति और महा विकास आघाड़ी। महायुति में BJP, शिंदे और अजित गुट सहयोगी हैं, जबकि महा विकास आघाड़ी में कांग्रेस, शरद पवार और उद्धव ठाकरे गुट मित्र दल हैं। दोनों गठबंधनों में आपसी खींचतान, मनमुटाव और एक-दूसरे के खिलाफ व्यूह रचना भी है। इसका असर बारामती में ननद-भौजाई की चुनावी लड़ाई में कितना और कैसा होगा यह 7 मई को मतदान के दिन ही दिखाई पड़ेगा।

आखिर एक साल बाद भी क्यों नहीं मिले गुड्डू बमबाज-शाइस्ता?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि 1 साल बाद भी गुड्डू बमबाज-शाइस्ता नहीं मिल पाए हैं! 15 अप्रैल 2023 का दिन प्रयागराज और उत्तर प्रदेश की राजनीति में अहम दिन के तौर पर दर्ज है। आज के दिन ऐसा कांड हुआ, जो पहले कभी देखने को नहीं मिला। रात के पहर में पुलिस कस्टडी में एक पूर्व सांसद और एक पूर्व विधायक की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई। बाहुबली अतीक अहमद (Atique Ahmed) और उसके छोटे भाई अशरफ (Ashraf) को गोलियों से छलनी कर दिया गया। इस घटना से हड़कंप की स्थिति हो गई। आज उस घटना को एक साल बीत गया है। उमेश पाल हत्याकांड के बाद से अतीक के उल्टे दिन शुरू हो गए थे। उस कांड में अतीक की पत्नी शाइस्ता परवीन को भी मुख्य साजिशकर्ता बनाया गया था। सीसीटीवी में बम फेंकते हुए दिखाई पड़ा गुड्डू मुस्लिम भी अतीक का खास गुर्गा था। अशरफ की पत्नी जैनब की भूमिका भी पाई गई। ये सभी आज तक फरार है। घटना के एक साल बाद भी कई सवाल मौजूं बने हुए हैं। अपराध से राजनीति की सीढ़ियां चढ़ने वाले अतीक अहमद का सिक्का प्रयागराज सहित पूर्वांचल और अवध क्षेत्र के दर्जनों जिलों में चलता था। वह गुजरात के साबरमती जेल में सजा काट रहा था। उसका छोटा भाई अशरफ बरेली जेल में सजायाफ्ता था। इस बीच 24 फरवरी को प्रयागराज में दिनदहाड़े वकील उमेश पाल की हत्या कर दी गई। अतीक के बेटे असद के साथ आए शूटर्स ने पूरी प्लानिंग के साथ गोली और बम मारकर उमेश को मौत के घाट उतार दिया। यही मामला अतीक के पूरे परिवार के लिए काल साबित हुआ। सीएम योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश को जवाब देते हुए भरे सदन में माफिया को मिट्टी में मिला डालने का ऐलान कर दिया। पुलिस-प्रशासन ऐक्टिव हो गया। पुलिस ने घटना के मुख्य आरोपी माफिया अतीक के बेटे असद अहमद और साथी गुलाम को झांसी में एनकाउंटर में मार गिराया था। 3 अन्य आरोपियों का अलग-अलग जगह एनकाउंटर हो चुका है। लेकिन, इस घटना में सबसे अधिक चर्चित हुआ गुड्डू बमबाज। वह कांड के दौरान झोले से बम निकाल कर लगातार बरसता दिखाई पड़ रहा था। गुड्डू मुस्लिम को लेकर तमाम किस्से गढ़े गए। सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक खास बवाल मचा। तमाम कहानियां निकलकर सामने आईं।

पिछले साल 24 फरवरी को की घटना को अंजाम देने के फरार बमबाज के गिरेबां तक यूपी पुलिस के हाथ नहीं पहुंच पाए हैं। गुड्‌डू मुस्लिम के साथ-साथ घटना को अंजाम दिलाने में बड़ी भूमिका निभाने वाली माफिया अतीक अहमद की पत्नी शाइस्ता परवीन भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है। पुलिस लगातार उमेश पाल के कातिलों को ढूंढ निकालने के दावे करती है, लेकिन गिरफ्तारी की कार्रवाई अब तक नहीं हो सकी है। वहीं अशरफ की पत्नी जैनब भी इनामी है और अभी तक चंगुल से बाहर है। इस घटना के एक साल के बाद भी पुलिस के हाथ खाली ही हैं। पुलिस अब भी सवालों पर जांच जारी होने की बात कर रही है। कोई ठोस जानकारी किसी भी स्तर से नहीं मिल पा रही है। उमेश पाल मर्डर के बाद भी सवाल वही है, आखिर गुड्‌डू मुस्लिम कहां गया? इस सवाल का जवाब न तो प्रयागराज पुलिस के पास है। न ही उमेश पाल केस की जांच करने वाली एसआईटी ही इस संबंध में कोई जवाब दे पा रही है। यूपी एसटीएफ की ओर से मामले की जांच के क्रम में देश के कई इलाकों में छापे मारे गए।

बमबाज गुड्‌डू मुस्लिम की तलाश के लिए पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, गोवा, मुंबई, नागपुर में छिपे होने की बात सामने आई। यूपी के मेरठ, श्रावस्ती से लेकर झांसी तक छापे मारे गए। लेकिन, गुड्‌डू मुस्लिम को पकड़ने में पुलिस कामयाब नहीं हुई। प्रयागराज पुलिस की ओर से उस पर 5 लाख रुपए का इनाम घोषित किया है। इसी तरह से शाइस्ता परवीन को भी पकड़ने में पुलिस कामयाब नहीं हो पाई है। शाइस्ता परवीन पर उमेश पाल के शूटरों को पनाह देने और हत्याकांड की प्लानिंग का आरोप लगा है। शाइस्ता को पकड़ने के लिए प्रयागराज पुलिस की ओर से 26 फरवरी से ही कार्रवाई शुरू हो गई। लेकिन, माफिया अतीक की पत्नी प्रयागराज में ऐसे गुम हुई कि पुलिस के खोजे नहीं मिल पा रही है।

माफिया सरगना की पत्नी का जाल इतना बड़ा है कि उस तक पहुंच पाना यूपी पुलिस के लिए संभव नहीं हो पा रहा है। यूपी पुलिस इस मामले में आरोपी अतीक के भाई अशरफ की पत्नी जैनब फातिमा तक नहीं पहुंच पाई है। 13 अप्रैल को असद अहमद के एनकाउंर और 15 अप्रैल को अतीक और अशरफ की हत्या के बाद उम्मीद की जा रही थी कि शाइस्ता और जैनब सामने आएंगे। दोनों बाहर नहीं आए। पुलिस इसके बाद से अब तक हवा में ही हाथ-पांव मारती नजर आ रही है। कातिलों तक पहुंचने के लिए एक साल के बाद भी पुलिस की तमाम कोशिश विफल रही है।

क्या उत्तर प्रदेश के मुसलमान हो गए हैं चुप ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या उत्तर प्रदेश की मुसलमान अब चुप हो गए हैं! आसमान साफ है। तेज धूप की बारिश हो रही है। मेरठ में घंटाघर के एक कोने में पसीने से लथपथ और बेदम लोगों का एक समूह भाजपा के झंडे लहरा रहा है। पार्टी के लिए वोट मांग रहा है। बाहर उठ रहे शोर और जुलूस को देखकर मेटल वर्क्स फैक्ट्री से कर्मियों का एक समूह बाहर निकला। जैसे उन्होंने चुनावी प्रचार कर रहे लोगों की भीड़ देखी, वापस मुड़कर जाने लगा। मुजम्मिल अब्बास नामक लड़के ने कहा कि इस सबसे दूर रहना ही बेहतर है। लोकसभा चुनाव 2024 के पहले चरण के चुनाव की प्रक्रिया खत्म हो चुकी है। यूपी की आठ सीटों पर 19 अप्रैल यानी शुक्रवार को वोटिंग होगी। पश्चिमी यूपी की इन आठ सीटों पर अगर 2019 के रिजल्ट देखें तो स्थिति समझ में आएगी। इस चरण की पांच सीटों पर 2019 में भारतीय जनता पार्टी को हार झेलनी पड़ी थी। सपा-बसपा गठबंधन को तब बड़े स्तर पर सफलता मिली थी। लेकिन, इस बार के चुनाव में सबसे अहम है मुस्लिम मतदाताओं की चुप्पी। राजनीतिक रैलियों से लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट हो या गांव के आसपास चौपाल की चर्चाओं में मुसलमानों की चुप्पी साफ देखी जा रही है। अलीगढ़ में एक कंप्यूटर प्रशिक्षण संस्थान चलाने वाले 38 वर्षीय मो. कामरान कहते हैं कि पिछले वर्षों के विपरीत मुसलमानों को लेकर बहुत अधिक नुक्कड़ बहसें नहीं होती हैं। देवबंद जैसी बड़ी अल्पसंख्यक उपस्थिति वाली जगहों पर भी मुस्लिम वोट बैंक का मुद्दा प्रभावी होता नहीं दिख रहा है। कामरान कहते हैं कि हमारा मनोबल गिरा हुआ है। निसंदेह डर है। कौन जानता है कि इसका गलत अर्थ निकाला जाएगा और पुलिस को रिपोर्ट कर दी जाएगी। हम सदैव चिंतित, सावधान रहते हैं। इसके अलावा एक समय यहां कई सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक कारक थे, वह प्रभाव कम होता दिख रहा है। मेरठ कार्यालय में एक बड़ी शीशे वाली मेज के पीछे बैठे एक व्यस्त धर्मार्थ अस्पताल के निदेशक से सवाल किया गया कि क्या यूपी में मुसलमान शांत हो गए हैं? उनका जवाब आता है, निश्चित रूप से। शामली, बागपत, आगरा कहीं भी चले जाइए। आप पाएंगे कि हमारी आवाजें दबी हुई हैं। हम अनावश्यक ध्यान आकर्षित नहीं करना चाहते। हम अब सबसे आगे नहीं आना चाहते। कोई भी पार्टी नहीं चाहती कि हम ‘चेहरा’ बनें। चतुराई से काम लेना बुद्धिमानी है, शोर-शराबा नहीं।

बुलंदशहर के सियाना में आम के बड़े बागों के मालिक एक व्यापारी ने इस बात पर सहमति जताई कि इस वक्त पर मुस्लिम की ज़ुबान तो बंद ही है। साथ ही, स्थानीय नेता या उम्मीदवार कहां हैं? हमें टिकट कौन दे रहा है? तो, हम किसके पक्ष में हैं? सहारनपुर, नगीना, बिजनौर, कैराना, पीलीभीत, रामपुर, मुरादाबाद और मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर शुक्रवार को मतदान होगा। इन सभी सीटों पर बड़ी संख्या में मुस्लिम वोटर हैं। पीलीभीत को छोड़कर इनमें से अधिकांश निर्वाचन क्षेत्रों में अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी 35 फीसदी से अधिक है।

कांग्रेस ने सहारनपुर में इमरान मसूद को मैदान में उतारा है। वहीं, कैराना में समाजवादी पार्टी के इकरा हसन और रामपुर में मोहिबुल्लाह नदवी मैदान में हैं। मायावती ने इरफान सैफी को मुरादाबाद से चुनाव लड़ने के लिए खड़ा किया है। मायावती ने पिछले हफ्ते मुजफ्फरनगर में एक रैली के दौरान कहा था कि वह अपनी पार्टी, बसपा से लड़ने के लिए एक मुस्लिम उम्मीदवार चाहती थीं, लेकिन कोई नहीं मिला… वे बहुत डरे हुए हैं।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पीएचडी कर रहे सलमान गौरी ने कहा कि एक तरह से मुसलमानों को अपना मुंह बंद रखने के लिए मजबूर किया गया है। कौन जेल जाना चाहता है? हमारे बीच इतने सारे गरीबों के साथ बोलकर अनावश्यक जोखिम लेना उचित नहीं है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हम ध्रुवीकृत चुनाव नहीं चाहते हैं। इसका मतलब होगा पहले से ही शक्तिशाली भाजपा को पहले से तैयार जीत सौंपना। देवबंद के मुफ्ती अरशद फारूकी जैसे कई समुदाय प्रमुखों और मौलवियों का कहना है कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से मोहभंग का मतलब वोट देने से मोहभंग नहीं है। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में लोकतांत्रिक प्रक्रिया हमारे लिए और अधिक कीमती हो गई है। मुझे यह स्पष्ट करने दीजिए। मुसलमानों से वोट डालने की अपील ईदगाहों, मस्जिदों, मदरसों से की गई है। ये अपीलें जारी रहेंगी।

धर्मार्थ अस्पताल के निदेशक भी मुसलमानों की चुप्पी को एक अलग नजरिए से पेश करते हैं। वे कहते हैं कि हमारा मसला विकास नहीं, वजूद का है। अर्थ समझाते हुए वे बताते हैं कि हमारा प्रमुख मुद्दा विकास नहीं है। यह अस्तित्व का मसला है। पहचान का मामला है। मुसलमान अब यह समझता है। वह उसी के अनुरूप मतदान करेंगे। नगीना लोकसभा सीट से आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष और निर्दलीय उम्मीदवार चंद्रशेखर आजाद को लेकर दावा करते हैं कि अगर वे जीत जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। नगीना आरक्षित सीट पर मुसलमानों की बड़ी आबादी है। वहीं, बीजेपी अल्पसंख्यक सेल के पश्चिमी यूपी उपाध्यक्ष कदीम आलम की एक अलग थ्योरी है। वे कहते हैं कि मुसलमानों को इस समय ऐसा लगता है जैसे वे गहरी नींद में हैं, क्योंकि वे भ्रमित हैं। वे किसे वोट देंगे? विपक्ष कहां है? यह सवाल हर किसी के मन में है।

क्या रामदेव बाबा की कंपनी ने दिया है धोखा क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट ?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या रामदेव बाबा की कंपनी ने धोखा दिया है या नहीं और सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या कहता है! सुप्रीम कोर्ट ने योगगुरु रामदेव और उनके सहयोगी बालकृष्ण को कोविड, कैंसर और हृदय संबंधी बीमारियों समेत कई स्वास्थ्य समस्याओं के जादुई इलाज की पेशकश करने पर आड़े हाथों लिया है। रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद ने विश्व स्वास्थ्य संगठन से मंजूरी न मिलने के बावजूद कोरोनिल टैबलेट के साथ कोविड का इलाज खोजने का दावा किया। खुद से पैकेजिंग और प्रमोशन में माहिर यह जोड़ी जिस तरह से असंख्य हर्बल औषधियों और गोलियों को पैकेज करते हैं, ये कोई साधारण व्यवसायी नहीं कर सकता है। उनके पास बहुत बड़ी संख्या में अनुयायी हैं, और उनके अनुयायियों में से कई अंधभक्त हैं। अंधभक्त भी आसान वोट बैंक हैं क्योंकि योग गुरु, मैं उन्हें बाबा नहीं कहूंगा। वो अपने समर्थकों को निर्देश देने खुशी महसूस करते हैं। बीजेपी शासित उत्तराखंड सरकार, जहां रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद का मुख्यालय है, उनको भी सुप्रीम कोर्ट की नाराज पीठ ने नहीं बख्शा। जस्टिस हिमा कोहली और अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने पूछा कि उन सभी गुमनाम लोगों का क्या होगा जिन्होंने पतंजलि की इन दवाओं का सेवन किया। जो ऐसी बीमारियों को ठीक करने के लिए बताई गई, जिनका इलाज नहीं हो सकता? पीठ ने केंद्र की ओर से दाखिल जवाब पर भी कोई कसर नहीं छोड़ी। कोर्ट ने कहा कि यह संतोषजनक नहीं है। केंद्र ने अदालत से कहा कि जादुई इलाज का दावा करने वाले विज्ञापनों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार राज्यों को है। कोर्ट ने कहा कि केंद्र के तर्क को मानना मुश्किल है। 2020 की शुरुआत में, जब भारत कोविड महामारी की पहली लहर से लड़ने के लिए संघर्ष कर रहा था, तब रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद ने बड़ा दावा किया। इसने कोविड का इलाज खोज लिया है, ऐसा तब कहा गया जब पूरा चिकित्सा जगत इस बात से जूझ रहा था कि तेजी से बढ़ रहे वायरस को कैसे ठीक किया जाए और कैसे रोका जाए।

कोविड का ‘इलाज’ कोरोनिल नाम की एक गोली का विज्ञापन करते हुए, रामदेव नरेंद्र मोदी सरकार के दो मंत्रियों- स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन और परिवहन, राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के साथ खड़े थे। रामदेव कैमरों पर मुस्कुराए, यहां तक कि उन्होंने सरकार की ओर से अनिवार्य किया गया मास्क पहनने की भी जहमत नहीं उठाई। न ही कोई ‘दो गज की दूरी’ थी। कोरोनिल को कोविड के लिए ‘पहला साक्ष्य-आधारित रिसर्च इलाज’ के रूप में प्रचारित किया गया था। इससे इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) काफी चिंतित था। डिटेल्स के अनुसार, जो अब व्यापक रूप से सभी जानते हैं, मुंबई स्थित फीजिशियन डॉ जयेश लेले ने सरकार के आयुष मंत्रालय में आरटीआई आवेदन दिया। ये मंत्रालय हेल्थकेयर के ट्रेडिशनल सिस्टम को रेगुलेट करता है। लेले को आरटीआई के जरिए जो जवाब मिला उससे उन्हें आश्चर्य नहीं हुआ। कोरोनिल को विश्व स्वास्थ्य संगठन की मंजूरी नहीं थी। दुख की बात ये है कि इस अवैज्ञानिक, अप्रमाणित, बहु-विज्ञापित टैबलेट के लिए केंद्रीय मंत्रियों के रूप में मजबूत राजदूत थे। इसके लाखों खरीदार भी थे, सभी को एक ऐसे वायरस से पीड़ित होने का डर था जो अचानक भारत के साथ-साथ दुनिया भर में महामारी बन चुका था।

कोरोनिल की बिक्री तेजी से हुई। बिक्री और पॉवरफुल मंत्रियों के जबरदस्त समर्थन से उत्साहित रामदेव ने 2021 में IMA की ओर से अदालत में दायर केस पर भी ध्यान नहीं दिया। पतंजलि आयुर्वेद ने अपना विज्ञापन जारी रखा। इसने फैटी लीवर, सिरोसिस, किडनी फेल्योयर और थायरॉयड सहित कई बीमारियों के लिए जादुई इलाज का दावा किया। ज्यादातर टीवी न्यूज चैनलों पर छाए रामदेव एक जाना-पहचाना चेहरा बन गए, जबकि पतंजलि आयुर्वेद ने ट्रक भरकर ‘दवाएं’ बांटीं। उन्हें अपने राजनीतिक संरक्षकों से ‘प्रतिरक्षा’ का इतना भरोसा था कि उन्होंने एलोपैथी को ‘बेवकूफ और दिवालिया’ तक कह दिया। एक बार फिर, IMA ने उनसे अपने दावे वापस लेने को कहा और डॉ. हर्षवर्धन से महामारी रोग अधिनियम के तहत योग गुरु के खिलाफ आरोप लगाने की अपील की। कानून का उल्लंघन सभी विज्ञापन उल्लंघन नहीं होते हैं, लेकिन औषधि और जादुई उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954, विशेष रूप से 54 बीमारियों के विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाता है। इस सूची में कैंसर, ब्लडप्रेशर और हृदय रोग सहित कई अन्य बीमारियां शामिल हैं।

आश्चर्यजनक रूप से या वास्तव में पतंजलि ने इन सभी के लिए इलाज की पेशकश की। जब से सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने पतंजलि और उसके संरक्षकों को ‘टुकड़े-टुकड़े’ करने की धमकी दी है, रामदेव और बालकृष्ण ने माफी मांगी है। हालांकि, अदालत उन्हें गंभीरता से लेने के मूड में नहीं है। उन्होंने पहले भी माफी मांगी थी और फिर तुरंत विज्ञापन के कारोबार में वापस चले गए थे। स्वास्थ्य संबंधी खतरा गंभीर है क्योंकि पतंजलि की पहुच बहुत बड़ी है। इसकी अपनी वेबसाइट का दावा है कि उसने यूएई से लेकर कनाडा और अमेरिका तक के बाजार स्थापित किए हैं। स्थानीय स्तर पर, 18 राज्यों में इसकी 47,000 से अधिक खुदरा दुकानें और गोदाम हैं। रामदेव को प्राप्त प्रतिरक्षा के स्तर से आश्चर्यचकित न हों। पिछले साल राज्यसभा में दिए गए एक जवाब के अनुसार, भ्रामक विज्ञापन देने के लिए पतंजलि के खिलाफ 53 शिकायतें मिली थीं।

कानून में भ्रामक विज्ञापनों के लिए जेल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। रामदेव ने पहले ही बिना शर्त माफी मांग ली है, लेकिन क्या यह यहीं तक सीमित रह जाएगी, क्योंकि योग गुरु ने उसी अदालत में दी गई माफी का उल्लंघन किया है? सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अमानुल्लाह ने पिछली सुनवाई में रामदेव को जमकर फटकार लगाई। उन्होंने कहा कि माफी मांगना ही काफी नहीं है। आपको अदालत के आदेश का उल्लंघन करने के परिणाम भुगतने चाहिए। हम इस मामले में उदार नहीं होना चाहते। इस मामले में उदारता स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है। सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक रूप से उनकी निंदा की है और उनके उत्पादों को धर्म और संस्कृति के नाम पर बड़े करीने से पैक किया है।

क्या केरल में बीजेपी को कोई आशा नजर आ रही है?

वर्तमान में बीजेपी को केरल में कोई ना कोई आशा नजर जरूर आ रही है! लोकसभा चुनाव से पहले केरल में चर्च को लेकर चर्चा तेज है। वे समुदाय की चिंताओं को प्रमुख चुनावी मुद्दे के रूप में उठाने की कोशिश कर रहे हैं। इसमें किसानों के मुद्दों से लेकर ईसाइयों पर हमलों तक शामिल हैं। इसके साथ ही वे गुटीय झगड़ों में भी बंटे हुए हैं। केरल में ईसाई 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की आबादी का 18.4% हिस्सा हैं। इसकी चुनावी राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका है। यहां सिरो मालाबार और मलंकारा चर्च और उनके संप्रदाय, सभी अपनी आवाज को दिल्ली तक पहुंचाने के लिए तैयार हैं। मार्च 2023 में, साइरो मालाबार चर्च के थालास्सेरी के आर्कबिशप, मार जोसेफ पैम्प्लानी ने कहा था कि रबर किसानों का वोट उस पार्टी को जाएगा जो रबर का एमएसपी ₹300 तय करेगी। केंद्र को उनका संदेश था कि अगर आप ₹300 का एमएसपी तय करने के बाद किसानों से रबर खरीदते हैं, तो हम राज्य से एक भी सांसद नहीं होने के आपके अफसोस को खत्म कर देंगे। पैम्प्लानी की घोषणा ने ऐसी हलचल पैदा कर दी जैसी पहले कभी नहीं हुई थी। तब से, चर्च के पदाधिकारियों ने फिर से जोर दिया है कि कोई भी पार्टी चर्च के लिए अछूत नहीं है। किसी भी पार्टी की राजनीतिक गुलामी नहीं होनी चाहिए। घाटी क्षेत्रों में अधिकांश ईसाई किसान हैं। इनमें से अधिकतर अपनी उपज की पर्याप्त कीमत नहीं मिलने के कारण संकट में हैं। कई किसान परिवारों पर कर्ज के बदले भारी बोझ चढ़ गया है। थालास्सेरी चर्च के वरिष्ठों के अनुसार, केंद्र को रबर के आयात को प्रतिबंधित करना चाहिए। इस तरह स्थानीय किसानों का समर्थन करना चाहिए। ‘ईसाइयों पर हमलों’ के बावजूद उनके तथाकथित बीजेपी समर्थक रुख के आरोप को बयान को विकृत करने के रूप में देखा गया। थालास्सेरी निकाय का कहना है कि समर्थन मुद्दा-आधारित है। रबर के एमएसपी का मणिपुर में हमलों से कोई लेना-देना नहीं है।

मणिपुर में हिंसा भड़कने से कुछ हफ्ते पहले पैम्प्लानी का बीजेपी को लेकर बयान आया था। इसके बाद चर्च के लिए बीजेपी के प्रयासों का खुलकर जवाब देना कठिन हो गया। उत्तर भारत में ईसाइयों पर हमले, सीएए का विरोध करने की आवश्यकता और मणिपुर की हिंसा चर्च के विभिन्न अंगों की तरफ से प्रकाशित पत्रिकाओं और पत्रिकाओं में चुभने वाले संपादकीय में बार-बार मुद्दे रहे हैं। हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ बातचीत में वरिष्ठ पादरी ने यहां तक कहा कि चर्च लीडरशिप में जो लोग एक साल पहले बीजेपी के पक्ष में बात करते थे, वे अब ऐसा नहीं कर रहे हैं। चर्च डेली दीपिका ने चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के तुरंत बाद 18 मार्च को एक मजबूत संपादकीय लिखा था। इसमें कहा गया है कि कई राज्यों में एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरता जब ‘अल्पसंख्यकों पर हमला’ न होता हो। इसमें कहा गया था कि राज्यों में भ्रष्टाचार और अहंकार ने भारत की तरफ से उठाए गए आरोपों में विश्वास की कमी को समझाया। सिरो मालाबार चर्च के पूर्व प्रवक्ता फादर पॉल थेलाकट ने ‘मणिपुर के अत्याचारों’ को ‘धर्म का पतन’ करार दिया था। इसमें लिखा गया था कि मैं हिंदू धर्म को उसके ऊंचे आदर्शों…उसकी आतिथ्य सत्कार और बहुलवादी भावना के लिए पसंद करता हूं। लेकिन वोटिंग पैटर्न हिंदुत्व के अनुकूल है, जिससे हर भारतीय को चिंतित होना चाहिए।

मणिपुर पर चर्च एक स्वर में बोलते हैं, लेकिन स्थानीय मुद्दों पर अलग-अलग सुर चल रहे हैं। मलंकारा चर्च के दो गुटों, ऑर्थोडॉक्स चर्च और जैकोबाइट चर्च के बीच दशकों से चल रहा झगड़ा पैरिशों पर कंट्रोल को लेकर है। सिरिएक ऑर्थोडॉक्स चर्च के वैश्विक प्रमुख ने फरवरी में केरल की ऐतिहासिक यात्रा के दौरान पिनाराई से मलंकारा चर्च विधेयक पारित करने का आग्रह किया था। यह एक बड़ा विवाद है। 2017 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने प्रभावी रूप से रूढ़िवादी गुट को सभी चर्च संपत्तियों पर नियंत्रण प्रदान कर दिया था। हालांकि, एलडीएफ के प्रति नरम जैकोबाइट गुट ने अपने गढ़ में कई चर्चों पर कब्जा करने का विरोध किया है। चर्च विधेयक प्रत्येक मामले में अधिकार और स्वामित्व पर ‘बहुमत’ के जरिये प्राधिकारी के रूप में समाधान की सिफारिश करता है। साथ ही जिला मजिस्ट्रेट को इस तरह के बहुमत का पता लगाने की सिफारिश करता है। जैकोबाइट चर्च इसका स्वागत करता है क्योंकि यह प्रभावी रूप से सुप्रीम कोर्ट के आदेश को दरकिनार करने में मदद करता है। ऑर्थोडॉक्स चर्च ने इस बिल का कड़ा विरोध किया है। यहां तक कि एक फरवरी के कार्यक्रम में केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान से समर्थन भी मांगा है।

सिरो मालाबार चर्च अप्रैल की शुरुआत में इडुक्की सूबा के कक्षा 10-12 के लिए पैरिश-लेवल वेकेशन के दौरान द केरल स्टोरी की स्क्रीनिंग की बचाव किया था। इसके अलावा करिकुलम में ‘लव जिहाद’ को शामिल करने का भी बचाव किया था। इसके विरोध में, विरोधियों ने एक अन्य सूबे में मणिपुर पर एक फिल्म की स्क्रीनिंग का आयोजन किया। फादर थेलाकाट जैसे चर्च के वरिष्ठ लोगों के लिए, ‘लव जिहाद’ का मुद्दा बनने की प्रवृत्ति परेशान करने वाली है। उन्होंने हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा कि हर धर्म में धार्मिक कट्टरवाद बढ़ रहा है। उन्होंने ‘समुदायों के बीच समस्याओं’ को सुलझाने के लिए बातचीत का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यह अफसोस की बात है कि ‘सिरो-मालाबार कैथोलिकों में अल्पसंख्यक सांप्रदायिक होते जा रहे हैं’।

पिछले क्रिसमस पर स्नेह यात्रा के हिस्से के रूप में, बीजेपी कार्यकर्ताओं ने सैकड़ों ईसाई घरों का दौरा किया। 2024 के चुनावों की घोषणा से कुछ हफ्ते पहले, त्रिशूर के बीजेपी उम्मीदवार सुरेश गोपी ने महत्वपूर्ण ईसाई आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्र, त्रिशूर में मुख्य गिरजाघर को एक स्वर्ण मुकुट की पेशकश की। गोपी ने यहां बीजेपी का वोट शेयर 2014 में 11% से बढ़ाकर 2019 में 28% कर दिया है। केरल में बीजेपी का कहना है कि पार्टी को ईसाइयों से अपने पक्ष में ‘साइलेंट वोटिंग’ की उम्मीद है। पीएफआई पर केंद्र के प्रतिबंध से कई ईसाइयों को राहत मिली है। पार्टी को उम्मीद है कि वह राज्य में राजनीतिक इस्लाम को लेकर बेचैनी का फायदा उठाएगी। चर्च प्रतिक्रिया दे रहा है।

क्या महाराष्ट्र में बीजेपी गढ़ पाएगी अपना किला?

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बीजेपी महाराष्ट्र में अपना किला गढ़ पाएगी या नहीं! महाराष्ट्र में जब भी हिंदुत्व की बात होती है, तो सबसे पहले बाल ठाकरे का नाम आता है। ऐसे में बीजेपी के लिए महाराष्ट्र में चुनौती बढ़ी है। बीजेपी ने इस बार 400 पार का दावा किया है। पार्टी संसद के दोनों सदनों में बहुमत हासिल करना चाहती है। लेकिन इतने बड़े टारगेट को हासिल करने के लिए महाराष्ट्र में बड़ी भूमिका होगी। यहां बीजेपी गठबंधन को पिछली बार से बेहतर प्रदर्शन करना होगा। 2019 में, बीजेपी-शिवसेना गठबंधन ने महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में से 41 पर जीत हासिल की। इसमें बीजेपी ने 23 और शिवसेना ने 18 सीटें मिलीं। शिवसेना के बंटवारे के साथ, महाराष्ट्र की लड़ाई रोमांचक हो गई है, ये एक महत्वपूर्ण राज्य बन गया है जो बीजेपी के लिए जीतना जरूरी है, और वह भी केवल संख्या के लिहाज से नहीं बल्कि अन्य कई नजरिए से भी। महाराष्ट्र एकमात्र ऐसा राज्य है जहां बीजेपी नहीं बल्कि एक क्षेत्रीय पार्टी हिंदुत्व की मिशाल बनती रही है, जिसके पास एक ऐसा जनाधार है जो शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन कर सकता है और राजनीतिक विरोधियों के साथ प्रभावी ढंग से बौद्धिक लड़ाई भी करने में सक्षम है। लेकिन महाराष्ट्र में हिंदुत्व कभी भी अपने आप काम नहीं कर पाया, केवल बाल ठाकरे द्वारा समर्थित मूलनिवासी मराठा मानुष राजनीति के साथ मिलकर काम किया। बीजेपी, जिसे ब्राह्मणों और सामाजिक और आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग द्वारा संचालित पार्टी माना जाता है, जिसमें शारीरिक या बौद्धिक ताकत की कोई क्षमता नहीं है। बीजेपी को बाल ठाकरे के नेतृत्व को स्वीकार करना पड़ा। लेकिन जैसे-जैसे इसका विस्तार हुआ, बीजेपी ने गठबंधन की शर्तों को तय करना शुरू कर दिया। 2014 में सत्ता संभालने के बाद, इसने महाराष्ट्र में शिवसेना को एक आश्रित गठबंधन का सहयोगी बना दिया, जिसे उपमुख्यमंत्री नियुक्त करने का भी मौका नहीं मिला।

2019 के विधानसभा चुनावों में महाराष्ट्र में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बावजूद, बीजेपी ने सरकार बनाने के लिए शिवसेना पर भरोसा किया। घटनाओं के एक नाटकीय मोड़ में, उद्धव ठाकरे ने बीजेपी से नाता तोड़ लिया और एनसीपी और कांग्रेस के साथ गठबंधन करके महा विकास अघाड़ी (एमवीए) की सरकार बना ली। सभी को हैरान करते हुए और तमाम बाधाओं के बावजूद, एमवीए ने कोविड महामारी के दौरान अच्छा प्रदर्शन किया। पार्टी ने प्रभावशाली नेतृत्व दिखाया। विशेष रूप से, उद्धव एक कुशल प्रशासक के रूप में उभरे, जिन्होंने सुषमा अंधारे जैसे बहुजन नेताओं को पार्टी में प्रमुख पद दिए। हाल के वर्षों में उद्धव ने प्रबोधनकर ठाकरे की विरासत का आह्वान किया है, जो कि गैर-ब्राह्मण आंदोलन के लिए बहुत महत्व रखने वाला नाम है। इस बात पर जोर देते हुए कि उनका हिंदुत्व शेंडी और जांवा, ब्राह्मण का ताला और पवित्र धागा किस्म का नहीं है, बल्कि भगवान हनुमान के गदाधारी जैसा है।

शिवसेना का मुकाबला करने के लिए बीजेपी ने कोंकणी मराठा सेना के दिग्गज नारायण राणे को राज्य में अपना चेहरा बनाया। पार्टी की स्वदेशी राजनीति में पैठ बनाने की बेताबी तब चरम पर पहुंच गई जब उसने चिपी एयरपोर्ट के उद्घाटन के दौरान हिंदी भाषी ज्योतिरादित्य सिंधिया से मराठी में बात करवाई। हालांकि, ये प्रयास शिवसेना और कांग्रेस और एनसीपी के साथ उसके गठबंधन को हिला पाने में विफल रहे। यह वह समय था जब महाराष्ट्र की दोनों क्षेत्रीय पार्टियों को आंतरिक उथल-पुथल का सामना करना पड़ा, जिसके कारण एकनाथ शिंदे और अजित पवार के नेतृत्व में दोनों में विभाजन हुआ। हालांकि, व्यापक रूप से माना जाता है कि बीजेपी ने विभाजन की साजिश रची, जिससे उद्धव और शरद पवार दोनों के लिए सहानुभूति ही बढ़ी है। इसके अलावा, उद्धव की सेना को बदनाम करने के अपने सभी प्रयासों के बावजूद, बीजेपी को बाल ठाकरे की मूलनिवासी हिंदुत्व विरासत का हवाला देना होगा।

प्रकाश अंबेडकर की वंचित बहुजन अघाड़ी (VBA) एक अन्य महत्वपूर्ण पार्टी है, जिसका दलित-बहुजन समर्थन आधार है। 2019 के आम चुनावों के दौरान, VBA ने कांग्रेस-NCP गठबंधन को प्रभावी रूप से कमजोर कर दिया, इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी-शिवसेना गठबंधन की मदद की। एमवीए वीबीए को समायोजित करने के लिए अनिच्छुक रहा है, जो शुरू में गठबंधन में शामिल नहीं होना चाहता था। वीबीए के अपने दम पर चुनाव लड़ने के फैसले को दलित-बहुजन जनता ने अच्छी तरह से स्वीकार नहीं किया, जिसके परिणामस्वरूप, एमवीए उम्मीदवारों के लिए अपना समर्थन व्यक्त करने की संभावना है, बीजेपी का आत्मविश्वास उसके कार्यकाल और उसके संसाधन-समृद्ध अभियान से बढ़ा है। लेकिन महाराष्ट्र में वह एनसीपी और शिवसेना के टूटने में अपनी भूमिका की नकारात्मक धारणा से जूझ रही है और सीटों को लेकर शिंदे सेना से जूझ रही है। 2019 में बीजेपी ने 25 में से 23 सीटें जीती थीं। यह मानना थोड़ा मुश्किल है कि इस बार वह उस रिकॉर्ड को सुधार पाएगी।